एक नई सोच, एक नई धारा

गीत : हाय! दिल से आह! निकली

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कोमल वाणी (फ़रीदाबाद)

प्रेम में जब प्रेम से ही,
खेलने की चाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

रात के अंतिम पहर तक एक टक तुमको निहारा
जल रहा था देख कर आकाश का हर इक सितारा
किसलिए विश्वास मेरा तोड़कर यूँ जा रहे हो
बोल भी दो किस वजह से छोड़कर यूँ जा रहे हो

प्रीत की इस रीत की जब,
खोखली हर थाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

साथ मेरा सात जन्मों तक निभाओगे कहा था
मुझको ही अर्धांगिनी अपनी बनाओगे कहा था
प्राण! मेरे तुम मुझे निष्प्राण करके जा रहे हो
फूल सा कोमल हृदय पाषाण करके जा रहे हो

ढूँढने से भी न कोई,
जब मिलन की राह! निकली
हाय! दिल से आह! निकली।।

व्यर्थ थी सब वेदनाएं व्यर्थ थी संवेदनाएं
व्यर्थ थी प्रियवर तुम्हारे मन की सारी चेतनाएं
प्रेम में डूबे नयन कब देख पाये छल तुम्हारा
इसलिए पीना पड़ा है जल मुझे भी आज खारा

दर्द से व्याकुल मेरे इस,
गीत पर भी वाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

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