एक नई सोच, एक नई धारा

लघुकथा : दोहरे चेहरे

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मीनाक्षी अग्रवाल “सरगम” (दिल्ली)

मिसेस शर्मा का आठ साल का बेटा धैर्य विडियो गेम से खेल रहा था,कमरे में चारों तरफ खिलौने फैले पड़े थे।उनकी कामवाली मालती का तीन साल का बेटा अचानक उस कमरे में आ गया और उस मासूम ने एक खिलौना उठा लिया।धैर्य को कोई फर्क नहीं पड़ा किन्तु तभी मिसेस शर्मा बिफरते हुए आयी,”मालती,संभाल अपने बच्चे को ,यूँ मेरे बेटे की किसी चीज को हाथ न लगाएं,और अगर नहीं संभलता तो यहाँ मत लाया कर”।
धैर्य बोला,”कोई बात नहीं मम्मी ,एक खिलौना ही तो है,मेरे पास तो कितने सारे हैं।”
“तू चुप कर, नौकरों को मुँह नहीं लगाते”।
कुछ दिन बाद धैर्य के जन्मदिन पर एक पेटी खिलौना और खाने पीने का सामान आया।धैर्य ने पूछा,” ये सब किसलिए मम्मी”।
मम्मी बोली,”अनाथालय के गरीब बच्चों को बाँटने के लिए,वहाँ मीडिया वाले भी आएंगे”।
दूर खड़ी मालती अजीब निगाहों से ये सब देख रही थी,पर नौकरानी थी तो कुछ कह न पायी।

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