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जमीन घोटाला मामला: CM हेमंत सोरेन की ‘डिस्चार्ज पिटीशन’ पर 30 जनवरी को होगी अहम सुनवाई

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राँची, झारखंड। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़े 8.86 एकड़ जमीन के कथित फर्जीवाड़े और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में एक बड़ा कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। रांची की विशेष PMLA (प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट) अदालत अब 30 जनवरी को मुख्यमंत्री द्वारा दायर ‘डिस्चार्ज पिटीशन’ (आरोप मुक्त करने की याचिका) पर विस्तृत सुनवाई करेगी।

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​मुख्य घटनाक्रम:

  • याचिका दाखिल: मुख्यमंत्री ने 5 दिसंबर 2025 को खुद को निर्दोष बताते हुए आरोपों से मुक्त करने का अनुरोध किया था।
  • हेमंत सोरेन का तर्क: आरोपों को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया और कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग का कोई ठोस सबूत नहीं है।
  • प्रारंभिक सुनवाई: सोमवार को इस याचिका पर शुरुआती दलीलें पेश की गईं, जिसके बाद कोर्ट ने अगली तारीख तय की।

​मामले की पृष्ठभूमि: बड़गाईं जमीन घोटाला

​यह पूरा विवाद रांची के बड़गाईं अंचल स्थित 8.86 एकड़ जमीन के स्वामित्व और दस्तावेजों में कथित हेराफेरी से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) का आरोप है कि इस जमीन को अवैध तरीके से हड़पने के लिए सरकारी दस्तावेजों में बदलाव किए गए और इसमें भारी वित्तीय लेन-देन हुआ।

मामले की टाइमलाइन:

  • 31 जनवरी 2024: 10 समन के बाद ED ने लंबी पूछताछ के बाद हेमंत सोरेन को गिरफ्तार किया।
  • जून 2024: लगभग पांच महीने न्यायिक हिरासत में रहने के बाद अदालत से उन्हें जमानत मिली।
  • चार्जशीट: ED ने अब तक इस मामले में दो चार्जशीट दाखिल की हैं। पहली चार्जशीट में सीएम समेत भानु प्रताप प्रसाद, विनोद सिंह और अन्य के नाम थे, जबकि दूसरी चार्जशीट में अंतू तिर्की समेत 10 अन्य आरोपी शामिल हैं।

​’डिस्चार्ज पिटीशन’ क्या है और इसके मायने?

​कानूनी प्रक्रिया के तहत, जब किसी आरोपी को लगता है कि उसके खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तो वह ‘डिस्चार्ज पिटीशन’ दाखिल कर सकता है।

  • सफल होने पर: यदि अदालत इसे स्वीकार करती है, तो हेमंत सोरेन इस मामले में सभी आरोपों से बरी हो जाएंगे, जो उनके लिए एक बड़ी राजनीतिक जीत होगी।
  • अस्वीकार होने पर: यदि याचिका खारिज होती है, तो कोर्ट औपचारिक रूप से आरोप तय (Frame Charges) करेगा और केस का ट्रायल (मुकदमा) आगे बढ़ेगा।

​राजनीतिक गलियारों में हलचल

​झारखंड की राजनीति में इस सुनवाई को काफी अहम माना जा रहा है। मुख्यमंत्री के समर्थक जहां इसे ‘न्याय की जीत’ की उम्मीद बता रहे हैं, वहीं विपक्षी दल इस पर कड़ी नजर रखे हुए हैं। 30 जनवरी का फैसला यह तय करेगा कि मुख्यमंत्री को इस कानूनी पचड़े से राहत मिलेगी या उनकी मुश्किलें और बढ़ेंगी।

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