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एक नई सोच, एक नई धारा

किसी की आंखें नम और किसी के होंठों पर मुस्कान बिखेरने का जादू है “तुम और इश्क़”
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साहित्यकार : आशीष श्रीवास

छत्तीसगढ़ : आज के दौर में देश बदल रहा, समाज बदल रहा, लोगों की जीवनशैली भी बदल रही और इस बदलाव का सबसे बड़ा आधार है सोच। यह सोच अक्सर प्रगतिशील और परिवर्तित हो रही है। इस बदलते सोच का असर साहित्य में भी बख़ूबी देखने को मिल रहा है। भारी भरकम शब्द से पिरोया गया साहित्य बदलते समाज में आम बोलचाल की भाषा में परिवर्तित हो गया है। आज के युवा अपनी भावनाओं को सरल शब्दों में इस तरह बुन रहे हैं कि लोगों का प्यार उन्हें भरपूर मिल रहा है।

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ऐसे ही एक युवा कवि आशीष श्रीवास छत्तीसगढ़ राज्य के हैं, जो अपनी ग़ज़ल, अपने साहित्य से युवाओं के साथ साथ हर वर्ग का प्यार पा रहे हैं। विज्ञान से एमएससी करने के बाद, हिंदी साहित्य से एमए की डिग्री भी हासिल की है। विज्ञान और साहित्य का यह संगम बदलते समाज का एक बेहतरीन उदाहरण है जो लोगों के दिलों में अपना स्थान अपनी कल्पना को तार्किकता के साथ प्रस्तुत करके बनाता है।

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बकौल आशीष “समाज के लिए कुछ करने से पहले समाज को जानना और पहचानना पड़ता है। साहित्य का सृजन हो या विज्ञान के क्षेत्र में कोई उपलब्धि बिना समाज को समझे सफल नहीं हो सकता है।” बचपन से साहित्य की ओर रुचि रखने वाले आशीष कब साहित्य सृजन करने लगे और कब कविता पाठ करते हुए मंच साझा करने लगे उन्हें पता ही नहीं चला। बस लोगो का प्यार, तालियों की आवाज़ उन्हें प्रोत्साहित करती रही और वे इस पथ पर अग्रसर होते रहे।

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यही कारण है कि आज उनकी एकल ग़ज़ल संग्रह “तुम और इश्क़” लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। युवाओं की आवाज़, उनकी भावनाओं को शब्द देने का कार्य करती यह किताब युवाओं को खासा पसंद आ रही है। ग़ज़ल के हर हर्फ़ युवा के साथ साथ अन्य वर्गों को भी गुजरते और गुजरे लम्हों में ले जाने का कार्य करने में सफल हो गई है। किसी की आंखें नम और किसी के होंठों पर मुस्कान बिखेरने का जादू है “तुम और इश्क़”।

आशीष श्रीवास को अभी तक मिले सम्मान

साहित्य सागर साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था की ओर से “काव्य लहरी सम्मान 2021”
साहित्य सागर साहित्यिक और सांस्कृतिक संस्था की ओर से “काव्य शिखर सम्मान 2021”
श्री सत्यम प्रकाशन द्वारा “साहित्य संचय सम्मान 2021”
अस्तित्व प्रकाशन द्वारा “उत्कृष्ट साहित्य सम्मान 2023”
तुलसी साहित्य अकादमी, छत्तीसगढ़ द्वारा “तुलसी साहित्य सम्मान 2024”
लिट्रेचर्स लाइट पब्लिशिंग, द लिट्रेचर्स टाइम्स एवं द शाइनिंग लिटरेचर के द्वारा संयुक्त रूप से “साहित्य स्पर्श पुरुस्कार 2024”

अटल बिहारी वाजपेयी के पुण्यतिथि पर उनके द्वारा रचित कुछ बेहतरीन कविताएं

अटल बिहारी वाजपेयी की पुण्यतिथि में आज पूरा देश ग़मगीन है और उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करके श्रद्धांजलि दे रहा है। 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे वाजपेयी जी तीन बार देश के प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजे। वाजपेयी जी को सन् 2015 में देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। एक कुशल राजनेता होने के साथ साथ वे पत्रकार, प्रखर वक्ता और एक कोमल हृदय के कवि भी थे। उनकी कविताओं में एक ओज और आशा का एक सुंदर तालमेल देखने को मिलता है। आइए पढ़ते हैं स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा रचित कुछ कविताएं…

दो अनुभूतियाँ

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पहली अनुभूति: गीत नहीं गाता हूँ

बेनक़ाब चेहरे हैं,
दाग़ बड़े गहरे हैं
टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ
लगी कुछ ऐसी नज़र
बिखरा शीशे सा शहर

अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

पीठ मे छुरी सा चांद
राहू गया रेखा फांद
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूँ
गीत नहीं गाता हूँ

दूसरी अनुभूति: गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए तारों से फूटे बासंती स्वर
पत्थर की छाती मे उग आया नव अंकुर
झरे सब पीले पात
कोयल की कुहुक रात

प्राची मे अरुणिम की रेख देख पता हूँ
गीत नया गाता हूँ

टूटे हुए सपनों की कौन सुने सिसकी
अन्तर की चीर व्यथा पलको पर ठिठकी
हार नहीं मानूँगा,
रार नई ठानूँगा,

काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूँ
गीत नया गाता हूँ

क़दम मिला कर चलना होगा

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बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ

AddText 08 14 11.36.38

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
सवेरा है मगर पूरब दिशा में
घिर रहे बादल
रूई से धुंधलके में
मील के पत्थर पड़े घायल
ठिठके पाँव
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से
मैं देख पाता हूं
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ

समय की सदर साँसों ने
चिनारों को झुलस डाला,
मगर हिमपात को देती
चुनौती एक दुर्ममाला,

बिखरे नीड़,
विहँसे चीड़,
आँसू हैं न मुस्कानें,
हिमानी झील के तट पर
अकेला गुनगुनाता हूँ।
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ।

आओ फिर से दिया जलाएँ

AddText 08 15 12.40.23

आओ फिर से दिया जलाएँ
भरी दुपहरी में अँधियारा
सूरज परछाई से हारा
अंतरतम का नेह निचोड़ें-
बुझी हुई बाती सुलगाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ

हम पड़ाव को समझे मंज़िल
लक्ष्य हुआ आँखों से ओझल
वर्त्तमान के मोहजाल में-
आने वाला कल न भुलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

आहुति बाकी यज्ञ अधूरा
अपनों के विघ्नों ने घेरा
अंतिम जय का वज़्र बनाने-
नव दधीचि हड्डियाँ गलाएँ।
आओ फिर से दिया जलाएँ।

कौरव कौन, कौन पांडव

AddText 08 15 12.47.54

कौरव कौन
कौन पांडव,
टेढ़ा सवाल है|
दोनों ओर शकुनि
का फैला
कूटजाल है|
धर्मराज ने छोड़ी नहीं
जुए की लत है|
हर पंचायत में
पांचाली
अपमानित है|
बिना कृष्ण के
आज
महाभारत होना है,
कोई राजा बने,
रंक को तो रोना है|

दूध में दरार पड़ गई

AddText 08 14 11.45.54

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

पुनः चमकेगा दिनकर

AddText 08 15 11.38.25

आज़ादी का दिन मना,
नई ग़ुलामी बीच;
सूखी धरती, सूना अंबर,
मन-आंगन में कीच;
मन-आंगम में कीच,
कमल सारे मुरझाए;
एक-एक कर बुझे दीप,
अंधियारे छाए;
कह क़ैदी कबिराय
न अपना छोटा जी कर;
चीर निशा का वक्ष
पुनः चमकेगा दिनकर।

न दैन्यं न पलायनम्

AddText 08 15 01.23.24

कर्तव्य के पुनीत पथ को
हमने स्वेद से सींचा है,
कभी-कभी अपने अश्रु और—
प्राणों का अर्ध्य भी दिया है।

किंतु, अपनी ध्येय-यात्रा में—
हम कभी रुके नहीं हैं।
किसी चुनौती के सम्मुख
कभी झुके नहीं हैं।

आज,
जब कि राष्ट्र-जीवन की
समस्त निधियाँ,
दाँव पर लगी हैं,
और,
एक घनीभूत अंधेरा—
हमारे जीवन के
सारे आलोक को
निगल लेना चाहता है;

हमें ध्येय के लिए
जीने, जूझने और
आवश्यकता पड़ने पर—
मरने के संकल्प को दोहराना है।

आग्नेय परीक्षा की
इस घड़ी में—
आइए, अर्जुन की तरह
उद्घोष करें : “न दैन्यं न पलायनम्।”

मैंने जन्म नहीं मांगा था

AddText 08 15 12.30.27

मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करुँगा।

जाने कितनी बार जिया हूँ,
जाने कितनी बार मरा हूँ।
जन्म मरण के फेरे से मैं,
इतना पहले नहीं डरा हूँ।

अन्तहीन अंधियार ज्योति की,
कब तक और तलाश करूँगा।
मैंने जन्म नहीं माँगा था,
किन्तु मरण की मांग करूँगा।

बचपन, यौवन और बुढ़ापा,
कुछ दशकों में ख़त्म कहानी।
फिर-फिर जीना, फिर-फिर मरना,
यह मजबूरी या मनमानी?

पूर्व जन्म के पूर्व बसी—
दुनिया का द्वारचार करूँगा।
मैंने जन्म नहीं मांगा था,
किन्तु मरण की मांग करूँगा।

मौत से ठन गई

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ठन गई!
मौत से ठन गई!

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

21 वीं शताब्दी के आधुनिक साहित्य रत्नों में शामिल हुए डॉ. एस.के.झा

कोल्हान विश्वविद्यालय चाईबासा, झारखंड के स्नातकोत्तर समाजशास्त्र विभाग में कार्यरत असिस्टेंट प्रोफेसर (नीड बेस्ड) डॉ०एस०के०झा बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। इनका जन्मस्थली तो वर्तमान बिहार में है, परंतु कर्मस्थली झारखंड है।आप पंचायती राज के विशेषज्ञ भी हैं,साथ ही झारखंड में इस क्षेत्र में कार्य करने व ग्रामीण समाज का अच्छा अनुभव भी रखते हैं। एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले डॉ०झा अपने मेहनत और लगन के साथ निरंतर संघर्ष के बाद रोज नई ऊंचाइयों को छू रहे हैं। दर्जनों समाजशास्त्रीय शोध आलेख व कई पुस्तकों की रचना हिंदी भाषा में लिख कर समाज के बारे में समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से पहल की है। सामाजिक सेवा में इनकी रुचि और कार्य काफी अनुकरणीय है,जिस वजह से इन्हें कई सम्मान व अवार्ड प्राप्त हुआ है। आपने “सूचना का अधिकार अधिनियम:2005 का भारतीय समाज पर प्रभाव ” पर डाॅक्टर आॅफ फिलासफी की उपाधि ग्रहण किए हैं।समन्वय की संस्कृति के पक्षधर, नियमानुसार व पारदर्शिता के साथ कार्य करने के तरीके, निर्धारित समय का पालन करना, प्रतिदिन चार से पांच घंटे अध्ययन करना,धैर्य और आत्मविश्वास के साथ प्रतिकुल परिस्थितियों को अनुकूल बनाने की जज्बा,निश्चय ही आपके व्यक्तित्व में निखार लाता है।

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डॉ०झा के द्वारा नित्य किए जा रहे कठोर परिश्रम व लगन ने ही देश विदेश के 134 रचनाकारों का जीवन परिचय में इनका भी जीवन परिचय प्रकाशित हुआ है।इस ऐतिहासिक जीवन परिचय की संकलनकर्ता सुमंगला सुमन ने सात महीने के अथक मेहनत से प्रकाशित की है। पुस्तक के प्रकाशन पर और 21 वीं सदी के आधुनिक साहित्य रत्न में हिंदुस्तान के जाने-माने साहित्यकारों में डाॅ०एस ०के०झा भी शामिल हैं। प्रकाशक और संकलन कर्ता सुमंगला सुमन को आभार व्यक्त करते हुए पुस्तक में सभी 134 साहित्यिक रत्नों को उज्जवल भविष्य की असीम शुभकामनाएं।

कविता : मेरे संग जय सिया राम कहो
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कविता तिवारी (उत्तर प्रदेश)

मन चंचल है, तन व्यूहल है
झंझावातों का है समूह
अगणित प्रतिकूल परीक्षाएँ
नित जीवन पथ लगता दुरूह

विकृतियाँ, कृतियों के दल का
यदि फलादेश सी लगती हों
संस्तुतियाँ चल विपरीत दिशा
यदि महाक्लेश सी लगती हों

यदि काव्यतत्व के समीकरण
संत्रास दिखाई देते हों
यदि वर्तमान वाले अवगुण
इतिहास दिखाई देते हों

यदि मर्यादाएँ मार्ग छोड़
पथ भ्रष्ट दिखाई देती हों
यदि नराधमों की अनुकृतियाँ
उत्कृष्ट दिखाई देती हों

कर दो विरोध के स्वर बुलंद
सबके हित में परिणाम कहो
निश्चित मत करो समय सीमा
फिर सुबह कहो या शाम कहो

तम हर, अंतर्मन उज्ज्वल कर
जय करुणाकर सुखधाम कहो
यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो
मेरे संग जय सिया राम कहो

शुभ लक्ष्य लिए आए अतीत
तब तो भविष्य के स्वप्न बुनों
अन्यथा सहज पथ पर चल कर
विक्षिप्त बनों, निज शीश धुनों

जो अंधकार का अनुचर है
अनुयायी है पथ भ्रष्टों का
औचित्य भला कैसे होगा
ऐसे निकृष्ट परिशिष्टों का

तुम याज्ञवल्क के वंशज हो
नचिकेता जैसा तप लेकर
हिरण्यकश्यप से युद्ध करो
प्रहलाद सरीखा जप लेकर

धुन के पक्के पौरुष वाले
ध्रुव जैसे श्रेष्ठ तपस्वी हो
वह कृत्य करो, अनुरक्ति भरो
जिससे यह विश्व यशस्वी हो

हो त्याज्य अशुभ कुल फलादेश
जागृत हो कर शुभ नाम कहो
जो संस्कृति के संरक्षक हो
उनको ही बस गुणधाम कहो

हो हंस वंश अवतंश श्रेष्ठ
होकर सकाम निष्काम कहो
यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो
मेरे संग जय सिया राम कहो

कर्तार उन्हें कर तार-तार
जो हैं कतार को तोड़ रहे
शुचिता-श्रद्धा-करुणा नकार
अपसंस्कृतियों को जोड़ रहे

उद्देश्य पूर्ण कर दे धरती
कर दे मानवता का विकास
क्षमता को दे जागरण मंत्र
तम हर भर दे सात्विक प्रकाश

तू निखिल विश्व का स्वामी है
अंतर्यामी घट-घट वासी
सज्जनता को कर दे विराट
कर खड़ी खाट जो संत्रासी

उद्भव-स्थिति-संहार-शक्ति
कुल तेरी ही तो छाया है
कहते हैं वेद, पुराण ग्रंथ
तुझमें ही विश्व समाया है

कवियो, भूमिका निभाओ तुम
यति-लय-गति-छंद-ललाम कहो
शुद्धतायुक्त परिमार्जन हो
मत उनको दक्षिण-वाम कहो

श्रद्धायुत नतशीर होकर के
तत्क्षण शत बार परिणाम कहो
यदि मुक्तिमार्ग चुनना चाहो
मेरे संग जय सिया राम कहो ।

गीत : हाय! दिल से आह! निकली
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कोमल वाणी (फ़रीदाबाद)

प्रेम में जब प्रेम से ही,
खेलने की चाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

रात के अंतिम पहर तक एक टक तुमको निहारा
जल रहा था देख कर आकाश का हर इक सितारा
किसलिए विश्वास मेरा तोड़कर यूँ जा रहे हो
बोल भी दो किस वजह से छोड़कर यूँ जा रहे हो

प्रीत की इस रीत की जब,
खोखली हर थाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

साथ मेरा सात जन्मों तक निभाओगे कहा था
मुझको ही अर्धांगिनी अपनी बनाओगे कहा था
प्राण! मेरे तुम मुझे निष्प्राण करके जा रहे हो
फूल सा कोमल हृदय पाषाण करके जा रहे हो

ढूँढने से भी न कोई,
जब मिलन की राह! निकली
हाय! दिल से आह! निकली।।

व्यर्थ थी सब वेदनाएं व्यर्थ थी संवेदनाएं
व्यर्थ थी प्रियवर तुम्हारे मन की सारी चेतनाएं
प्रेम में डूबे नयन कब देख पाये छल तुम्हारा
इसलिए पीना पड़ा है जल मुझे भी आज खारा

दर्द से व्याकुल मेरे इस,
गीत पर भी वाह! निकली।
हाय! दिल से आह! निकली।।

लघुकथा : दोहरे चेहरे
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मीनाक्षी अग्रवाल “सरगम” (दिल्ली)

मिसेस शर्मा का आठ साल का बेटा धैर्य विडियो गेम से खेल रहा था,कमरे में चारों तरफ खिलौने फैले पड़े थे।उनकी कामवाली मालती का तीन साल का बेटा अचानक उस कमरे में आ गया और उस मासूम ने एक खिलौना उठा लिया।धैर्य को कोई फर्क नहीं पड़ा किन्तु तभी मिसेस शर्मा बिफरते हुए आयी,”मालती,संभाल अपने बच्चे को ,यूँ मेरे बेटे की किसी चीज को हाथ न लगाएं,और अगर नहीं संभलता तो यहाँ मत लाया कर”।
धैर्य बोला,”कोई बात नहीं मम्मी ,एक खिलौना ही तो है,मेरे पास तो कितने सारे हैं।”
“तू चुप कर, नौकरों को मुँह नहीं लगाते”।
कुछ दिन बाद धैर्य के जन्मदिन पर एक पेटी खिलौना और खाने पीने का सामान आया।धैर्य ने पूछा,” ये सब किसलिए मम्मी”।
मम्मी बोली,”अनाथालय के गरीब बच्चों को बाँटने के लिए,वहाँ मीडिया वाले भी आएंगे”।
दूर खड़ी मालती अजीब निगाहों से ये सब देख रही थी,पर नौकरानी थी तो कुछ कह न पायी।

लघुकथा : वो राजा, मैं राजा
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श्वेता अग्रवाल “ग़ज़ल” (सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल)

अरे माँ, तूने मिस कर दी आज की पार्टी, कितनी शानदार थी। पता नहीं ये लोग दिन में पार्टी क्यों करते हैं, रात को होती तो तू भी शामिल रहती। जानती है माँ, एक बड़ी सी गाड़ी से सूट और बढ़िया बढ़िया महंगे कपड़े पहन कर कुछ लोग आये। एक बच्चे का जन्मदिन था। सब उसे राजा बुला रहे थे और सही में लग भी राजा जैसा ही था। वैसे तो मेरा भी नाम राजा है पर किस्मत राजा वाली नही मिली। खैर छोड़, अब सुन क्या हुआ। खूब सारे नौकर, उसके दोस्त, परिवार वाले हम सबके लिये मिठाई, कपड़े और फल लेकर आये थे। केक भी क्या मस्त था देखने मे भी और खाने में भी। आज तो मज़ा आ गया। हमारे साथ फ़ोटो भी ली उन लोगो ने। वो राजा और मैं राजा, पर मैं तो आपका जन्मदिन कभी नहीं मनाया। तू कब आएगी मेरा जन्मदिन मनाने बोल न माँ?”
“क्या राजा तू फिर शुरू हो गया। भाई अपनी तकदीर में यह सब नही लिखा। तू सोचना छोड़ दे। चल केक खाएगा तो बोल। अभी भी बचा हुआ है।” राजा का दोस्त कुमार उसे टोकते हुए कहता है।
“और सुन, तेरी माँ उधर नहीं, आसमान के इस तरफ है, मेरी माँ से बात कर रही, देख।” और दोनों खिलखिलाने लगे।

हाँ एक नारी हूँ मैं
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रचना बंसल (दिल्ली)

ईश्वर की बनाई हर रचना में ,सबसे खूबसूरत प्यारी हूँ मैं,
चाहें कितने पतझड़ आयें, खिलते फूलों की क्यारी हूँ मैं,
हाँ , एक नारी हूँ मैं।
इन चूड़ियों को मेरे हाथों की जंजीर समझ न कर गलती,
इन जंजीरों को भी पिघला सकती हूँ , वो चिंगारी हूँ मैं,
हाँ एक नारी हूँ मैं।
कोमल हूँ मैं ,कमजोर नहीं, देखों किसी पर बोझ नहीं,
मेरा अपना भी वजूद है, तुम न समझना बेचारी हूँ मैं,
हाँ एक नारी हूँ मैं।
करुणा, ममता,सहनशील और त्याग ही पहचान है मेरी,
एक जीव को जन्म देने वाली, मौत से भी ना हारी हूँ मैं
हाँ एक नारी हूँ मैं।
अंत में..
जीवन मरण के समय चक्र में हर सवाल का जवाब लिए,
दुर्गा, शक्ति का अवतार हूँ, शक्ति स्वरूपा हितकारी हूँ मैं,
हाँ एक नारी हूँ मैं।

ज़रूरी है…
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महक (दिल्ली)

हाँ ज़रूरी है गलती करना भी
ज़िन्दगी में तजुर्बे गलतियों से आते हैं
ज़रूरी हैं ज़िन्दगी में तजुर्बे भी
अनुभव के रास्ते गुज़र कर
ज़िन्दगी अपने सयानेपन को ओढ़ती है
बेशक गलती करना गुनाह नहीं है
हाँ, मगर गलती से सीख ले लेना
सीख ले लेना कि फिर वो गलती न हो
क्योंकि सीख की सीढ़ी पर ही
ज़िन्दगी कदम बढ़ाती है…!
करना गलती बेशक….
मगर रुक न जाना ज़िन्दगी
ठहरना दो पल..सोचना खुद को
और थाम कर सीख की लाठी
फिर बढ़ जाना ज़िन्दगी
बेशक गलती करना गुनाह नही
पर फिर उसी गलती को दोहराना
एक बड़ा अपराध है
जिसमें फिर शेष बचता है
पछतावा
अविश्वास
सज़ा
नाउम्मीदी
इसीलिए..
बेशक गलती करना
पर सीख कर तुजुर्बे के साथ
आगे बढ़ जाना
नए रास्ते , नई मंज़िल को पाने…!

हर गम को इस दिल में छुपाना सीखा है
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स्नेहा अग्रवाल ‘गीत’ (झुंझुनूं, राजस्थान)

हर गम को इस दिल में छुपाना सीखा है।
बेवफाई में मिली चोट को भुलाना सीखा है।

इतने आँसू मिले हैं, बेदर्दी तेरे इस प्यार में,
हमने हर दर्द से मुहब्बत जताना सीखा है।

संग मिल देखे थे हमने, कभी ख़्वाब हसीन,
अब सपनों की दुनिया से दूर जाना सीखा है।

तेरे संग हँस के की थी कभी प्यार भरी बातें,
अब आँसू पी, तन्हाई में मुस्कुराना सीखा है।

मिलती नहीं है हर किसी को मंजिल प्यार में,
‘गीत’ ने इस टूटे दिल को समझाना सीखा है।

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