एक नई सोच, एक नई धारा

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वायरल वीडियो : “हमरा सरकारी नौकरी वाली मेहरारू चाही” बोर्ड लेकर लड़का चौराहे पर हुआ खड़ा, देखें वीडियो
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छपरा : शादी जीवन का एक अहम भाग है और अपने जीवनसाथी को लेकर हर व्यक्ति कि अपनी सोच भी है। यूं तो हर व्यक्ति को अपने जीवन में जीवनसाथी की जरूरत होती है। हर कोई चाहता है कि उसका लाइफ पार्टनर हो। आज का युवा अपना फैसला खुद करता है। पहले माता-पिता और बड़े बुजुर्गों के कहने से शादी विवाह हो जाता था। लेकिन आज का युवा अपनी पसंद से ही शादी करता है। कुछ लोग अपने जान-पहचान में शादी करने में विश्वास रखते हैं तो कुछ के मैट्रिमोनियल साइट पर भरोसा रखते हैं। इन बातों से इतर अभी सोशल मीडिया पर एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक युवक हाथों में बोर्ड लेकर सड़क पर खड़ा है। (जारी…)

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देखा जाए तो सरकारी नौकरी वाला लड़का की खोज सबसे ज्यादा हमारे देश में होती है लेकिन बोर्ड में भोजपुरी में लिखा हुआ है कि हमरा सरकारी नौकरी वाली मेहरारू चाही। आपको बता दें कि यह घटना बिहार के छपरा की है। इससे संबंधित वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। लोग इस पर तरह-तरह के कमेंट कर रहे हैं। कुल मिलाकर हर कोई इस वीडियो को देखकर जरूर हंस दे रहा है।

सोशल मीडिया पर वीडियो हो रहा तेजी से वायरल

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बताते चलें कि इन दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इस वायरल वीडियो में आप देख सकते हैं कि एक शख्स ने अपने गले में शादी वाली माला और सिर पर दूल्हे की पगड़ी पहन रखी है। उसके हाथों में एक बोर्ड साफ दिख रहा है। इस बोर्ड पर उसने भोजपुरी में लिखा है, “हमरा सरकारी नौकरी वाली मेहरारू चाही, दहेज हम देम।” इसका मतलब है कि, “मुझे सरकारी नौकरी वाली एक पत्नी चाहिए। इसके बदले में मैं दहेज भी दूंगा।” इस अनोखे तरीके से पत्नी की तलाश करने की वजह से यह वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। उस सड़क से आने जाने वाला हर इंसान एक बार जरूर रुक कर उस युवक को निहारता है। सोशल मीडिया में वायरल इस वीडियो पर लोगों द्वारा अलग अलग तरह की प्रतिक्रियाएं भी आ रही है।

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राष्ट्रकवि दिनकर जयंती स्पेशल : किसान परिवार में जन्में बालक से राष्ट्रकवि तक का सफर, जाने पूरी कहानी

राष्ट्रकवि दिनकर जयंती स्पेशल : रामधारी सिंह दिनकर की आज 115वीं जयंती है। इनका जन्म 23 सितंबर 1908 को बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया गांव में हुआ था। राष्ट्रकवि के बारे में कई दिलचस्प बातें है। उनका बचपन संघर्षों से भरपूर था। वह स्कूल जाने के लिए पैदल चलकर गंगा घाट तक का सफर तय किया करते थे। इसके बाद फिर गंगा के पार उतरकर यह पैदल चलते थे। “राष्ट्रकवि” रामधारी सिंह दिनकर का जन्म एक किसान परिवार में हुआ था। ओज, विद्रोह, आक्रोश के साथ ही कोमल शृंगारिक भावनाओं के कवि रामधारी सिंह दिनकर का पहला काव्य संग्रह 1928 में प्रकाशित “बारदोली – विजय” संदेश था।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कवि ने हिन्दी को दिलाई थी पहचान

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रामधारी सिंह दिनकर ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी को पहचान दिलाई थी। बीसवीं सदी में जिन लेखकों ने हिंदी भाषा और साहित्य को राष्ट्रीयस्तर पर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलायी, उनमें रामधारी सिंह दिनकर का नाम सर्वोपरि है। वह एक ऐसे लेखक थे, जिनमें राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक चेतना के साथ साथ सांस्कृतिक चेतना भी गहरे रूप से मौजूद थी। वह उद्घोष और उद्बोधन के कवि थे, तो प्रेम और सौंदर्य के भी कवि थे। वह सत्ता के करीब थे, तो व्यवस्था के एक आलोचक भी थे। दिनकर पर राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से हाल ही में एक पुस्तक आयी है। उनके गृह जिले बेगूसराय में जन्में वरिष्ठ पत्रकार और प्रसार भारती के वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी सुधांशु रंजन ने इस किताब को लिखा है। पत्रकार अरविंद कुमार ने इस किताब के बहाने दिनकर को उनकी 115वीं जयंती पर याद किया है।

दिनकर ने लिखी “विपथगा” जैसी क्रांतिकारी कविता

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1935 में दिनकर का कविता संग्रह रेणुका प्रकाशित हुआ था। इसमें उसकी भूमिका माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखी थी। हालांकि, उसमें देशभक्ति की कविताओं के कारण सरकार ने उनकी दरियाफ्त की और चेतावनी देकर छोड़ दिया था। इससे पहले 26 दिसम्बर 1933 को वह तांडव कविता लिख चुके थे। इसमें उग्र राष्ट्रीयता है और इसका पाठ उन्होंने वैद्यनाथ मंदिर (देवघर) में सांध्य श्रृंगार के समय किया था। 1931 में वह कसमें देवाय जैसी कविता लिख चुके थे, जिसमें लेखक के शब्दों में “शोषण और अन्याय के प्रति महाविद्रोह है।” (जारी…)

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1934 में बोधिसत्व नामक कविता लिखी, जिसमें सामाजिक भेदभाव, द्वेष और असहिष्णुता के विरुद्ध चीत्कार है, जहां अछूत गरीबों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता। दिनकर ने “विपथगा” जैसी क्रांतिकारी कविता लिखी, जिसके बारे में बेनीपुरी की राय थी कि वह दुनिया की किसी श्रेष्ठ क्रांतिकारी कविता के समकक्ष है। “श्वानों को मिलते दुग्ध वस्त्र भूखे बच्चे अकुलाते हैं, मां की हड्डी से चिपक ठिठुर जाड़ों की रात बितातें हैं।”

प्रसिद्ध आलोचक डॉक्टर कुमार विमल के अनुसार, ”दिनकर की तुलना ” अग्निवीणा के कवि नजरुल इस्लाम के साथ की जा सकती है। लेकिन, दिनकर सौंदर्य प्रेम और काम के भी कवि थे। ऊर्वशी इसका प्रमाण है लेकिन, उनके जीवन काल में ही ऊर्वशी को लेकर विवाद हुआ। वामपंथी आलोचकों ने उसके विरोध में तीखा लिखा। (जारी…)

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भगवत शरण उपाध्याय जैसे प्रसिद्ध इतिहासकार और आलोचक ने “कल्पना” जैसी प्रसिद्ध पत्रिका में इस किताब के खिलाफ 40 पेज का लेख लिखा। कल्पना का ऊर्वशी विवाद पर अंक ही आया था। अब वह किताब के रूप में आ गया है। सुधांशु का कहना है कि दिनकर को समग्रता में नहीं देखा गया है, इसलिए उनका सम्यक मूल्यांकन साहित्य में नहीं किया गया। पाठकों में वे लोकप्रिय बहुत हुए पर वामपंथी आलोचना ने उनके साथ न्याय नहीं किया, क्योंकि उनकी दृष्टि में दिनकर का राष्ट्रवाद उग्र रूप लिये हुए था।

1933 में जब दिनकर 26 वर्ष के थे। इस दौरान उन्होंने “हिमालय के प्रति” कविता, जो बाद में उनकी बहुचर्चित कविता बन गयी और पाठ्यक्रमों में भी लगी। भागलपुर के कवि सम्मेलन में इन्होंने यह कविता सुनायी, तो श्रोताओं में काशी प्रसाद जायसवाल भी झूम उठे।

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जतिन दास पुण्यतिथि स्पेशल : उनका वो बम जिसने हिला दी अंग्रेज सरकार की नींव, जाने जीवन कहानी

यतीन्द्र नाथ दास उर्फ जतीन्द्र नाथ दास उर्फ जतिन दास। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का अनमोल हीरा, जिनकी आज यानी 13 सितंबर को पुण्यतिथि है। कोलकाता में जन्म हुआ। नौ साल के थे तभी मां ने दुनिया छोड़ दी। पिता बड़े जतन से उन्हें पढ़ने को प्रेरित कर रहे थे। वे पढ़ने तो जाते लेकिन उस समय आजादी का आंदोलन देश में चल रहा था, धीरे-धीरे बालक यतीन्द्र ने देश की आजादी में अपना योगदान देने का फैसला किया। महज 17 साल की उम्र में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में कूद पड़े।

अंग्रेज पुलिस ने उन्हें अन्य आंदोलनकारियों के साथ गिरफ्तार कर लिया। अब वे स्कूल की जगह जेल पहुंच गए। आंदोलन जब धीमा पड़ा तो कुछ दिन बाद जेल से रिहा कर दिए गए।

जब यतीन्द्र नाथ का खून खौल उठा

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जेल में रहने के दौरान उनमें देश प्रेम का ज्वार बढ़ने लगा था। अब वे कुछ बड़ा योगदान देना चाहते थे। भारत माता को जल्दी से जल्दी आजाद देखना चाहते थे। जब वे असहयोग आंदोलन में कूदे तो उसे अंतिम जंग मान लिया। उन्हें लगा कि अंग्रेज इसी से देश छोड़कर भाग जाएंगे। पर, अंग्रेज कहीं नहीं गए। हां, असहयोग आंदोलन एक तरह से वापस ले लिया गया। वह महात्मा गांधी का अपना तरीका था। यतीन्द्र को यह बात पसंद नहीं आई। उनका खून खौल रहा था।

वे कुछ नया सोचते हुए आंदोलन में शामिल होते रहे और पिता के सुझाव पर कोलकाता में बीए करने को राजी हो गए। एडमिशन हो गया, कुछ दिन क्लासेज भी चलीं लेकिन इसी दौरान उनकी गतिविधियों को देखते हुए अंग्रेज पुलिस ने फिर गिरफ्तार कर लिया।

जेल पहुंचकर उन्होंने देखा कि राजनीतिक कैदियों के साथ अफसर दुर्व्यवहार कर रहे हैं। जरूरी सुविधाएं भी नहीं मिल रही हैं। इनकी मांग को लेकर पहले उन्होंने अफसरों से बातचीत की। जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो उन्होंने जेल में ही भूख हड़ताल शुरू कर दी। उस समय यह कोई आसान काम नहीं था और 21 की उम्र में तो बिल्कुल नहीं। पहले जेल अफसरों ने उनके आंदोलन को गंभीरता से नहीं लिया।

20 दिन तक भूख हड़ताल पर रहे

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जेफ अफसरों को लग रहा था कि दो-चार दिन में आंदोलन की हवा निकल जाएगी। पर, यतीन्द्र तो 20 दिन तक भूख हड़ताल पर डटे रहे। अंत में जेल अधीक्षक ने न केवल उनसे माफी मांगी बल्कि रिहा भी कर दिया। भूखे रहने के बावजूद जब वे जेल से छूटे तो उत्साह दोगुना हो चुका था। अंग्रेज अफसर ने उनसे माफी जो मांग ली थी। जेल से निकल कर वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के संस्थापक शचीन्द्र नाथ सान्याल से मिले जो गर्म दल के आंदोलनकारी थे। थोड़ी देर में ही यतीन्द्र को लगा कि यह सही जगह है और वे गहरे तक उनसे जुड़ गए. वहीं यतीन्द्र न बम बनाना सीख लिया। अब वे पूरी तरह से स्वतंत्रता आंदोलन में डूब चुके थे।

भगत सिंह और चंद्रशेखर से मुलाकात

साल 1928 में उनकी मुलाकात सरदार भगत सिंह से हुई। फिर चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल भी मिले। उनकी प्रेरणा से यतीन्द्र ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए बम बनाना शुरू कर दिया। उन्हीं के बनाए बम से भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को सेंटर असेंबली पर बम फेंका था। यह एक ऐसा हमला था जिससे ब्रिटिश सरकार हिल गई।

आनन-फानन सबकी गिरफ़्तारी के आदेश हुए और एक-एक कर सब जेल भेज दिए गए, यतीन्द्र भी पकड़े गए। लाहौर जेल में रखकर इन पर सशस्त्र विद्रोह का आरोप लगाया गया। लाहौर जेल में यतीन्द्र ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनके साथ अन्य क्रान्तिकारी भी थे। मांग जरूरी सुविधाओं की थी, जो नहीं मिल पा रही थीं। बहुत कठिन परिस्थितियों में भारतीय क्रांतिकारी जेल में समय काट रहे थे।

जब उनके आंदोलन से अंग्रेज भी सहम गए

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यतीन्द्र का यह आंदोलन धीरे-धीरे चर्चा का विषय बन गया। अंग्रेज अफसर भी सहम से गए। उन्हें जबरन पाइप से दूध पिलाने का प्रयास किया गया। दर्द बढ़ता गया लेकिन वे झुके नहीं। आंदोलन जारी रखा। 63 दिन तक लगातार चले इस आंदोलन के बाद 13 सितंबर 1929 को उन्होंने अंतिम सांस ली। 27 अक्तूबर 1904 को दुनिया में आया एक बालक महज 25 साल की उम्र में देश पर मर मिटा।

अंतिम संस्कार में 5 लाख से अधिक लोग शामिल

यतीन्द्र के अंतिम संस्कार में पांच लाख से ज्यादा लोग शामिल हुए। सड़कों पर लोगों का हुजूम था। लाहौर से कोलकाता तक रास्ते में बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। नेहरू, गणेश शंकर विद्यार्थी ने उन्हें कानपुर स्टेशन पर श्रद्धांजलि देने पहुंचे। हावड़ा स्टेशन पर सुभाष चंद्र बोस ने उनके अंतिम दर्शन किए। एक आंदोलनकारी की असमय जेल में मृत्यु के बाद उसकी लोकप्रियता ने अंग्रेजों के माथे पर बल ला दिया।

इसके बाद से उन्होंने किसी भी आंदोलनकारी का शव परिवार को नहीं सौंपा। फांसी के बाद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शव गुपचुप सतलुज नदी के किनारे आधी रात अंतिम संस्कार कर दिए। सुभाष चंद्र बोस ने उनकी तुलना ऋषि दधीचि से की थी। उनकी मौत के बाद देश भर में प्रदर्शन हुए।

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क्या भारतीय कानून के अनुसार वारंटी व्यक्ति न मिलने पर पुलिस घर के किसी सदस्य को उठा सकती है, आइए जानते है अधिवक्ता अंकित पांडेय की इस लेख से

जमशेदपुर : भारतीय कानून के तहत पुलिस किसी व्यक्ति को बिना किसी सबूत या कानूनी आदेश के उठा कर नहीं ले जा सकती है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अधिकारों का संरक्षण कानूनी होता है, और यह सुनिश्चित करना आवश्यक होता है कि किसी भी गिरफ्तारी का विधिपूर्वक क्रियान्वयन किया जाता है। (जारी…)

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यदि पुलिस किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करना चाहती है, तो उन्हें कानूनी दस्तावेजों के साथ विधिपूर्वक गिरफ्तार करना होता है, और यह गिरफ्तारी केवल उस व्यक्ति के खिलाफ लगाये गए आरोपों के आधार पर होती है। घर के अन्य सदस्यों को बिना किसी कानूनी आदेश के उठा कर ले जाना गैरकानूनी होता है। (जारी…)

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मित्रों, यह जानना बेहद आवश्यक है। पुलिस किसी को भी 24 घंटे से अधिक हिरासत में नहीं रख सकती। भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता यानी सीआरपीसी की धारा 57 में यह व्यवस्था दी गई है। उसे गिरफतार व्यक्ति को 24 घंटे के अंदर कोर्ट में पेश करना जरूरी है।

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“कहाँ राजा भोज – कहाँ गंगू तेली” क्या जानते हैं आप इस कहावत की पूरी सच्चाई या आप भी करते हैं इसका गलत प्रयोग

बचपन से लेकर आज तक हजारों बार इस कहावत को सुना गया होगा कि “कहां राजा भोज – कहां गंगू तेली” आमतौर पर यह ही पढ़ाया और बताया जाता था कि इस कहावत का अर्थ अमीर और गरीब के बीच तुलना करने के लिए है, लेकिन इसकी सत्यता कितनी है इसके बारे में शायद ही किसी ने सोचा होगा। आइए जानते है इस कहावत का सच…

इस बहुप्रचलित कहावत का सच भोपाल जाकर पता चलता है कि कहावत का दूर-दूर तक अमीरी- गरीबी से कोई संबंध नहीं है और ना ही कोई गंगू तेली से संबंध है, आज तक तो सोचते थे कि किसी गंगू नाम के तेली की तुलना राजा भोज से की जा रही है और यह बात पूर्णतः गलत साबित होती हुई दिखती है, बल्कि गंगू – तेली नामक शख्स तो खुद राजा थे। (जारी…)

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इस बात का पता चलने पर यह तो तय है कि आश्चर्य की सीमा अपनी पराकाष्ठा पर होगी और होनी भी चाहिए, एक उम्र से जिस कहावत का अर्थ गलत निकाला जा रहा था वह अचानक से बदल जो गया। परन्तु साथ ही साथ यह भी समझ आया कि यदि घुमक्कड़ी ध्यान से करो तो आपके ज्ञान में सिर्फ वृद्धि ही नहीं होती बल्कि आपको ऐसी बातें पता चलती है जिस तरफ किसी ने ध्यान ही नहीं दिया होता और यह सोचकर हंसी भी आती है। यह कहावत हम सब के लिए सबक है जो आज तक इसका इस्तेमाल अमीरी गरीबी की तुलना के लिए करते आए हैं।

इस कहावत का संबंध मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल और उसके जिला धार से है, भोपाल का पुराना नाम भोजपाल हुआ करता था। “भोजपाल” नाम धार के राजा भोजपाल से मिला। समय के साथ इस नाम में से “ज” शब्द गायब हो गया और नाम भोपाल हो गया।
धार के सम्राट राजाभोज बहुत ही प्रतापी और अजेय राजा थे। उनके पराक्रम और शौर्य की चर्चा दूर-दूर तक होती थी। उनसे अदावत मोल लेना कोई नहीं चाहता था। (जारी…)

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अब बात करते हैं कहावत की, कहा जाता है, कलचुरी के राजा गांगेय अर्थात गंगू और चालूका के राजा तेलंग अर्थात तेली ने एक बार राजा भोज के राज्य पर हमला कर दिया इस लड़ाई में राजा भोज ने इन दोनों राजाओं को हरा दिया।

उसी के बाद व्यंग्य के तौर पर यह कहावत प्रसिद्ध हुई “कहां राजा भोज-कहां गंगू तेली” राजा भोज की विशाल प्रतिमा भोपाल के वीआईपी रोड के पास झील में लगी हुई है। (साभार)

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LAW : क्या आप जानते हैं, कानून संबंधित इन जानकारियों को ? जाने अपने अधिकार, देखें वीडियो

आम जन जीवन में कोई नहीं चाहता कि कभी थाना कचहरी के चक्कर लगे लेकिन यदि चक्कर लग ही गया तो जानकारी के आभाव में परेशान हो जाते हैं और कई तो थक हार कर सबकुछ नियति पर छोड़ देते हैं। तो आइए जानते हैं कानून की कुछ महत्वपूर्ण जानकारियां अधिवक्ता अंकित पांडेय से :

◆ यदि आप पुलिस स्टेशन का चक्कर काट रहे हैं और पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कर रही तो 112 नम्बर पर पहले कॉल कर लें, यह टोल फ्री नंबर होता है और पुलिस कंट्रोल रूम में यह कॉल लगता है और यह रिकॉर्ड भी होता है। इसके बाद भी पुलिस शिकायत दर्ज नहीं कर रही तो आप इसे कोर्ट में चैलेंज भी कर सकते हैं।
◆ आप थाना जाते हैं और आपको यदि लिखना नहीं आता है तो भी आप शिकायत दर्ज करा सकते हैं, इसके लिए आप पुलिस को सारी जानकारी बताते जाएंगे और वह शिकायत लिखेंगे और उसकी एक कॉपी भी आपको धारा 152 (2) सीआरपीसी के तहत देगी और इसका कोई चार्ज भी नहीं ले सकती पुलिस।
◆ आप यदि हिंदी या अंग्रेजी नहीं भी जानते है तो भी आप अपने क्षेत्रीय भाषा में भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं, और पुलिस को आपकी शिकायत दर्ज करनी होगी।
◆ यदि संज्ञेय अपराध (cognizable offence) हुआ है और पुलिस आपकी रिपोर्ट नहीं लिख रही तो आप धारा 166A के तहत पुलिस पर कार्रवाई करा सकते हैं। आपको बस पुलिस का नाम, पद और किस थाना से हैं यह लिख कर देना होता है।

संज्ञेय अपराध :

संज्ञेय और असंज्ञेयअपराध की परिभाषा क्रीमिनल प्रोसिजर कोड (CrPC 1973) की धारा 2 (सी) और 2 (एल) में दी गई है। इस अधिनियम की धारा 2 (सी) कहती है कि ऐसा अपराध जिसमें पुलिस किसी व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है, वह संज्ञेय अपराध कहलाता है। पुलिस के पास संज्ञेय अपराधों में बिना वारंट गिरफ्तार करने के अधिकार है।

संज्ञेय अपराध कौन से हैं :

अगर आपको यह जानना है कि संज्ञेय अपराध कौन से हैं तो आपको क्रीमिनल प्रोसिजर कोड (CrPC 1973) का शेड्यूल 1 देखना होगा, जिसमें हत्या, बलात्कार, दहेज़ हत्या, अपहरण, दंगा करना आदि को संज्ञेय अपराध की सूची में रखा गया है। यहां आपको संज्ञेय अपराध की पूरी लिस्ट मिलेगी। इस लिस्ट में गंभीर प्रवृति के अपराध शामिल किए गए हैं।

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एक ऐसा वृक्ष जिसके सिर्फ फल में ही नहीं अंग अंग में औषधि है

यूँ तो हर फल की अपनी ख़ासियत और गुण होते हैं। बीमार लोगों से मिलने जाना हो या भगवान को भोग लगाना हो, फल एक अहम किरदार निभाता है हमारी जीवन में। लोगों में मौसमी फल को लेकर भी एक अलग उत्साह देखने मिलता है और हो भी क्यों नहीं मौसमी फल हमारे लिए होते भी हैं फायदेमंद और कई फल तो हमारी आये दिन होने वाली बीमारी के लिए रामबाण का भी कार्य करती हैं, लेकिन एक फल ऐसा भी है जिसके सिर्फ फल ही नहीं अपितु पूरे का पूरा वृक्ष ही औषधि का कार्य करती है और वह है जामुन। आईये जानते हैं इसकी खूबी के बारे में – (नयना भारद्वाज)

★ अगर जामुन की मोटी लकड़ी का टुकडा पानी की टंकी में रख दे तो टंकी में शैवाल, हरी काई नहीं जमेगी और पानी सड़ेगा भी नहीं।

★ जामुन की इस खुबी के कारण इसका इस्तेमाल नाव बनाने में बड़ा पैमाने पर होता है।

★ पहले के जमाने में गांवो में जब कुंए की खुदाई होती तो उसके तलहटी में जामून की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है जिसे जमोट कहते है।

★ दिल्ली की निजामुद्दीन बावड़ी का हाल ही में हुए जीर्णोद्धार से ज्ञात हुआ 700 सालों के बाद भी गाद या अन्य अवरोधों की वजह से यहाँ जल के स्तोत्र बंद नहीं हुए हैं।

★ भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख के.एन. श्रीवास्तव के अनुसार इस बावड़ी की अनोखी बात यह है कि आज भी यहाँ लकड़ी की वो तख्ती साबुत है जिसके ऊपर यह बावड़ी बनी थी। श्रीवास्तव जी के अनुसार उत्तर भारत के अधिकतर कुँओं व बावड़ियों की तली में जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल आधार के रूप में किया जाता था।

★ स्वास्थ्य की दृष्टि से विटामिन सी और आयरन से भरपूर जामुन शरीर में न केवल हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाता। पेट दर्द, डायबिटीज, गठिया, पेचिस, पाचन संबंधी कई अन्य समस्याओं को ठीक करने में अत्यंत उपयोगी है।

★ एक रिसर्च के मुताबिक, जामुन के पत्तियों में एंटी डायबिटिक गुण पाए जाते हैं, जो रक्त शुगर को नियंत्रित करने करती है। ऐसे में जामुन की पत्तियों से तैयार चाय का सेवन करने से डायबिटीज के मरीजों को काफी लाभ मिलेगा।

★ सबसे पहले आप एक कप पानी लें। अब इस पानी को तपेली में डालकर अच्छे से उबाल लें। इसके बाद इसमें जामुन की कुछ पत्तियों को धो कर डाल दें। अगर आपके पास जामुन की पत्तियों का पाउडर है, तो आप इस पाउडर को 1 चम्मच पानी में डालकर उबाल सकते हैं। जब पानी अच्छे से उबल जाए, तो इसे कप में छान लें। अब इसमें आप शहद या फिर नींबू के रस की कुछ बूंदे मिक्स करके पी सकते हैं।

★ जामुन की पत्तियों में एंटी बैक्टीरियल गुण होते हैं. इसका सेवन मसूड़ों से निकलने वाले खून को रोकने में और संक्रमण को फैलने से रोकता है। जामुन की पत्तियों को सुखाकर टूथ पाउडर के रूप में प्रयोग कर सकते हैं. इसमें एस्ट्रिंजेंट गुण होते हैं जो मुंह के छालों को ठीक करने में मदद करते हैं। मुंह के छालों में जामुन की छाल के काढ़ा का इस्तेमाल करने से फायदा मिलता है। जामुन में मौजूद आयरन खून को शुद्ध करने में मदद करता है।

★ जामुन की लकड़ी न केवल एक अच्छी दातुन है अपितु पानी चखने वाले (जलसूंघा) भी पानी सूंघने के लिए जामुन की लकड़ी का इस्तेमाल करते।

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एक बारात ऐसा भी ! 28 किमी पैदल चलकर पहुंचा दूल्हा, यह देख रो पड़ी दुल्हन

ओडिशा : गाजे-बाजे-डीजे और घोड़ी के बगैर भला कोई बारात होती है? लेकिन मजबूरी कुछ भी करा सकती है। कहीं दुल्हन नाराज न हो जाए, शादी न टूट जाए…इस चिंता में रायगड़ा जिले में न केवल बाराती, बल्कि दूल्हा भी शादी के लिए 28 किमी पैदल चला। बिना ढोल-बाजों और लाइटिंग से परे यह बारात ऐसी दिख रही थी, मानों लोग किसी तीर्थयात्रा पर पैदल निकले हों। पूरे ओडिशा में ड्राइवरों की हड़ताल के कारण दूल्हे और उसकी बारात को व्हीकल्स ही नहीं मिले।

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दुल्हन का दिल धक-धक कर रहा था, लेकिन दरवाजे पर रात 3 बजे बारात देखकर खुशी से रो पड़ी, पढ़िए 8 बड़ी बातें

1.ओडिशा में ड्राइवरों के एकता महामंच ने हड़ताल रखी थी। इसके चलते कहीं भी व्हीकल्स नहीं चल रहे थे। जब कहीं से भी व्हीकल्स का इंतजाम नहीं हुआ, तब बारातियों को गुरुवार की रात(16 मार्च) पार्थीगुड़ा गांव से पैदल ही बारात ले जाने का फैसला किया। आखिरकार वे रात 3 बजे दुल्हन के घर पहुंचे।

2.दूल्हे नरेश प्रस्का(22 साल) ने अपनी बारात के लिए चार एसयूवी का इंतजाम किया था, लेकिन ड्राइवरों के हड़ताल पर चले जाने से उनकी योजना पर पानी फिर गया।

3.दूल्हे ने कहा-“हमने टूव्हीलर्स पर शादी के लिए आवश्यक सामग्री भेजी और आठ महिलाओं सहित परिवार के लगभग 30 सदस्यों, रिश्तेदारों और दोस्तों ने पैदल चलने का फैसला किया। यह एक लंबी यात्रा थी, लेकिन एक यादगार अनुभव भी था।”

4.रायगड़ा के कल्याणसिंहपुर ब्लॉक के सुनखंडी ग्राम पंचायत के अंतर्गत पार्थीगुड़ा गांव आता है। दूल्हा जब पैदल ही बारात लेकर पहुंचा, तो दुल्हन के परिजन खुशी से झूम उठे और नम आंखों से उनका स्वागत किया।

5.चूंकि शादी का कार्यक्रम शुक्रवार(17 मार्च) की सुबह के दौरान हुआ था, इसलिए शादी की रस्में देर से शुरू हुईं और दोपहर तक पूरी हो गईं।

6. शादी की रस्में पूरी होने के बाद खाने का आयोजन किया गया। आमतौर पर रिसेप्शन रात में होता है, लेकिन यह डिनर न होकर लंच बन गया।

7.नरेश की शादी दिबालापाडू गांव में तय हुई थी। दूल्हे के करीबी दोस्त सुंदर प्रस्का ने कहा कि दूल्हे दूल्हा अब तभी दुल्हन को लेकर घर लौटेगा, जब हड़ताल खत्म होने पर उन्हें गाड़ी मिल सके।

8.दुल्हन के चाचा ने कहा-“हम आदिवासी हैं और लंबी यात्राओं से परिचित हैं। हम रात में भी सड़कों से परिचित हैं और शादियों के लिए पैदल चलना आम बात है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों से अब व्हीकल्स का ही उपयोग किया जा रहा है।”

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कृष्ण से ऐसी लागी लगन कि एलएलबी की छात्रा ने भगवान श्री कृष्ण से ही रचाई शादी

वृंदावन (मथुरा)। ऐसी लागी लगन मीरा हो गई मगन… वो तो गली गली हरि गुण गाने लगी…इस भजन के माध्यम से मीरा का भगवान कृष्ण के प्रति प्रेम भाव व्यक्त किया गया है, लेकिन औरैया की रहने वाली रक्षा सोलंकी की प्रीत भी कन्हैया के प्रति कम नहीं है।

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वृंदावन घूमने के दौरान श्रीकृष्ण को ही सब कुछ मान बैठी रक्षा ने शनिवार को उनसे विवाह रचा लिया। श्रीकृष्ण की प्रतिमा को गोद में लेकर सात फेर लिए और विवाह की सभी रस्में निभाईं गईं। उसके साथ परिवार व अन्य लोगों को दावत भी दी गई।
रक्षा सोलंकी औरैया के बिधूना कस्बे की रहने वाली हैं। पिता रणजीत सोलंकी ने बताया कि जुलाई 2022 बेटी उनके साथ वृंदावन आईं थी और अपना सब कुछ कन्हैया को मान बैठीं। तभी से वह ठाकुर जी के साथ शादी की रट लगाए हुई थी। बेटी को श्रीकृष्ण भक्ति में लीन देख माता-पिता उसकी बात नहीं टाल सके।
रक्षा सोलंकी ने 11 मार्च को औरैया में अपने रिश्तेदारों की मौजूदगी में भगवान कृष्ण की मूर्ति के साथ शादी कर ली। रक्षा एमए के बाद एलएलबी की पढ़ाई कर रहीं हैं। पिता पूर्व प्रधानाचार्य हैं। उनके चार बच्चे हैं, जिनमें 3 बेटियां और एक बेटा है। रक्षा सोलंकी ने कहा कि उसे पिछले काफी समय से सपने आ रहे हैं कि भगवान कृष्ण उनके पास आए हैं और उसके गले में वरमाला डालीं। शादी के लिए चारों ओर से सामाजिक दबाव बन रहा था तो कन्हैया के साथ ही शादी कर ली।

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किसी फ़िल्म से कम नहीं अंगेश यादव की कहानी, जिसे परिवार ने मृत समझा वो 15 साल बाद घर लौटा

देवरिया: सर्प दंश के बाद मरा समझ कर जिस दस वर्ष के बेटे को नदी में बहाया गया था, वह बच्चा पंद्रह साल बाद रविवार को घर पहुंचा। घर पहुंचने के बाद बच्चे के घर वालों के यहां जश्न का माहौल है। यह कहानी नहीं बल्कि सच्ची घटना देवरिया के जिरासो गांव के मुरासो टोला की है।

मईल थाना क्षेत्र के जिरासो गांव के मुरासो टोला निवासी रामसुमेर यादव के दस वर्षी बेटा अंगेश यादव को 15साल पहले सर्प ने दंश लिया था। उसके मुंह से झाग निकलने लगा। परिजनों ने झाड़ फूंक कराया, कोई फायदा नहीं हुआ। फिर डॉक्टर के पास ले गए तो डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया।

आखिर में मान्यता के अनुसार केले के तने में रखकर उसे सरयू नदी में बहा दिया। अंगेश यादव ने बताया कि मुझे कुछ मालूम नहीं था। होश आने पर मुझे पता चला कि पटना के पास एक सपेरे अमन माली ने मुझे झाड़ फूंक से ठीक कर पाला।

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अपनी माँ और चाची के साथ अंगेश यादव

दूर-दूर तक सर्प का तमाशा दिखाने ले जाने लगा। कुछ दिन कटिहार में रखा। उसके बाद वह पांच साल पहले उसे अमृतसर ले गया। वहां एक जमींदार के यहां नौकरी पर रख दिया। उससे जो वेतन मिलता वह लेने लगा। तीन महीने से वह हमारे ऊपर एक लड़की से शादी करने का दबाव बनाने लगा।

इसलिए कि दोनों काम करेंगे और पैसा वह लेगा। 24 फरवरी को अंगेश ने एक ट्रक ड्राइवर को अपनी आपबीती सुनाई। ट्रक ड्राइवर उसे आजमगढ़ लाया। अंगेश ने ट्रक चालक को भागलपुर, बेल्थरा रोड पता बताया तो वह दूसरे ट्रक से बेल्थरा रोड भेज दिया।

बेल्थरा रोड पर उसने गांव के कुछ लोगों का नाम बताया। उसी में किसी परिचित ने जिरासो गांव के प्रधान को फोटो वाट्सएप कर दिया। गांव में चर्चा होने लगी। इसी बीच भूलकर अंगेश बलिया जिले के थाना मनियर चला गया। प्रधान के साथ परिजन बेल्थरा रोड गए और पता लगाते मनियर थाने पहुंचे।

वहां अंगेश यादव ने माता कमलावती देवी और चाची सम्भलावती देवी को पहचान लिया। शिक्षक, शिक्षिकाओं और पास पड़ोस के लोगों का नाम बताने लगा। अंगेश को मरा समझ कर जिस कपड़े में बहाया गया था वह लाल टीशर्ट और काला पैंट भी अपने साथ लाया है।

मनियर थाने की पुलिस ने प्रधान की मौजूदगी में सुपुर्दगी लिखवाकर घर भेज दिया। गांव के प्रधान पति सत्येंद्र यादव ने बताया कि लड़के ने पड़ोसी, मित्र, दोस्तों, माता, चाची को पहचान लिया है, सभी लोग संतुष्ट हैं।

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