एक नई सोच, एक नई धारा

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गिग वर्कर्स की जीत: ब्लिंकिट समेत सभी प्लेटफॉर्म्स से हटेगा ’10 मिनट डिलीवरी’ का दावा, सरकार ने सुरक्षा को बताया सर्वोपरि

नई दिल्ली: देश के लाखों डिलीवरी पार्टनर्स (गिग वर्कर्स) की लंबी लड़ाई आज रंग लाई। केंद्र सरकार के कड़े हस्तक्षेप के बाद, क्विक कॉमर्स दिग्गज Blinkit समेत Zepto, Swiggy और Zomato ने अपने विज्ञापनों और ऐप से ’10 मिनट में डिलीवरी’ का विवादास्पद दावा हटाने का फैसला किया है। केंद्रीय श्रम मंत्री मनसुख मांडविया के साथ हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद यह ऐतिहासिक निर्णय लिया गया।

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सरकार का सख्त संदेश: “जान पहले, रफ्तार बाद में”

​श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी व्यावसायिक लाभ के लिए कामगारों की जान जोखिम में नहीं डाली जा सकती।

  • सुरक्षा प्राथमिकता: केंद्रीय मंत्री ने कंपनियों को दोटूक कहा कि 10 मिनट का दबाव डिलीवरी बॉयज को यातायात नियमों के उल्लंघन और सड़क हादसों की ओर धकेलता है।
  • विज्ञापनों पर रोक: कंपनियों ने आश्वासन दिया है कि वे अपने ब्रांडिंग, विज्ञापनों और सोशल मीडिया पोस्ट से समय सीमा (Time Limit) के दावों को तुरंत हटा लेंगे।

हड़ताल से शुरू हुआ था बदलाव का सफर

​इस फैसले के पीछे 31 दिसंबर की रात हुई गिग वर्कर्स की देशव्यापी हड़ताल की बड़ी भूमिका रही।

  • मजदूरों की मांग: डिलीवरी बॉयज ने मांग की थी कि तेज डिलीवरी के चक्कर में उन्हें ‘सुपरह्यूमन’ न समझा जाए और उनकी सुरक्षा के लिए विधिक ढांचा तैयार हो।
  • जोखिम की रिपोर्ट: आंकड़ों के अनुसार, कम समय में डिलीवरी के दबाव के कारण क्विक कॉमर्स सेक्टर में काम करने वाले युवाओं के सड़क हादसों में 25% की वृद्धि देखी गई थी।

कंपनियों का नया रुख

​अब कंपनियां ‘स्पीड’ के बजाय ‘विश्वसनीयता’ और ‘गुणवत्ता’ पर ध्यान केंद्रित करेंगी। जेप्टो, स्विगी और जोमैटो के अधिकारियों ने सहमति जताई है कि वे अपने एल्गोरिदम में बदलाव करेंगे ताकि डिलीवरी पार्टनर्स पर समय का अनुचित मानसिक और शारीरिक दबाव न रहे।

​”यह केवल गिग वर्कर्स की जीत नहीं है, बल्कि यह संदेश है कि भारत के श्रम कानूनों में आधुनिक तकनीक के साथ-साथ मानवीय मूल्यों का भी स्थान है।” — मनसुख मांडविया, केंद्रीय श्रम मंत्री

विशेषज्ञों की राय

​बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भले ही ग्राहकों को सामान मिलने में कुछ मिनटों की देरी हो, लेकिन यह सड़कों को सुरक्षित बनाने और श्रम अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम है।

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सीनी: 40 दिनों से लापता कोमल मुखी का सुराग नहीं, मां ने जताई अनहोनी की आशंका; SP से लगाई गुहार

सरायकेला/सीनी: सीनी हरिजन बस्ती की रहने वाली कोमल मुखी पिछले 2 दिसंबर 2025 से लापता है, लेकिन सवा महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस के हाथ खाली हैं। बेटी की तलाश में दर-दर भटक रही मां रानी मुखी अब अपनी पुत्री के साथ किसी अनहोनी की आशंका से थर्रा उठी हैं। उन्होंने सरायकेला-खरसावां आरक्षी अधीक्षक (SP) से न्याय और बेटी की सकुशल बरामदगी की गुहार लगाई है।

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शिवा मुखी एवं कोमल मुखी

क्या है पूरा मामला?

​परिजनों और दर्ज प्राथमिकी के अनुसार, घटना 2 दिसंबर 2025 की है। आरोप है कि परसूडीह (झारखंड बस्ती) निवासी शिवा मुखी, पिता राजू मुखी, कोमल को शादी की नीयत से बहला-फुसलाकर भगा ले गया है।

कानूनी प्रक्रिया में देरी का आरोप:

  • 9 दिसंबर 2025: मां ने सीनी टीओपी (TOP) में पहला सनहा दर्ज कराया।
  • 4 जनवरी 2026: लगभग एक महीने बाद मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई।
  • महिला थाना: सरायकेला महिला थाने में भी मामले की जानकारी दी गई, लेकिन अब तक कोई ठोस सुराग नहीं मिला है।

शादी का दावा बनाम मां की आशंका

​लापता युवती की मां रानी मुखी ने बताया कि आरोपी शिवा मुखी द्वारा सामाजिक स्तर पर यह प्रचारित किया जा रहा है कि उसने कोमल से शादी कर ली है। हालांकि, आरोपी के पास न तो कोई विवाह प्रमाण पत्र है और न ही उसने कोमल को उसकी मां या समाज के सामने पेश किया है।

मां के गंभीर सवाल:

  1. संपर्क पर पाबंदी: “अगर शादी हुई है, तो मुझे मेरी बेटी से मिलने क्यों नहीं दिया जा रहा?”
  2. सामाजिक बैठक से दूरी: आरोपी को सामाजिक बैठकों में बुलाया गया, लेकिन वह उपस्थित नहीं हुआ, जिससे संदेह और गहरा गया है।
  3. अप्रिय घटना का डर: मां ने आशंका जताई है कि उनकी बेटी को बंधक बनाकर रखा गया है या उसके साथ कोई गंभीर घटना घटित हो सकती है।

प्रशासनिक हस्तक्षेप की मांग

​थानों के चक्कर लगाकर थक चुकी रानी मुखी ने अंततः जिला आरक्षी अधीक्षक कार्यालय में आवेदन देकर गुहार लगाई है कि उनकी बेटी को बरामद किया जाए और आरोपी पर सख्त कार्रवाई की जाए। स्थानीय लोगों में भी पुलिस की सुस्त कार्यप्रणाली को लेकर आक्रोश देखा जा रहा है।

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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: कुत्ते के काटने पर अब राज्य सरकारें देंगी मुआवजा, ‘कुत्ता प्रेमियों’ को भी लगाई फटकार

नई दिल्ली: देश के शहरी इलाकों, खासकर दिल्ली-एनसीआर में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक पर सुप्रीम कोर्ट ने आज (13 जनवरी 2026) एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि आवारा कुत्तों के हमले में घायल होने या मौत होने की स्थिति में अब राज्य सरकारें पीड़ित परिवार को मुआवजा देने के लिए बाध्य होंगी।

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“कुत्तों को घर ले जाएं, सड़कों पर आतंक न फैलाएं”

​मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ की बेंच ने आवारा कुत्तों को खिलाने वाले (Feeders) और उनके प्रति अत्यधिक सहानुभूति रखने वालों पर कड़ी टिप्पणी की।

  • जवाबदेही तय: जस्टिस नाथ ने कहा, “जो लोग कुत्तों को खाना खिलाते हैं, उन्हें जिम्मेदारी भी लेनी होगी। अगर आपको उनसे इतना ही प्रेम है, तो उन्हें अपने घर के अंदर रखें। उन्हें सड़कों पर भटकने के लिए क्यों छोड़ा जाता है, जहाँ वे बच्चों और बुजुर्गों को डराते और काटते हैं?”
  • भावुकता बनाम सुरक्षा: जब वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने इसे एक भावुक मुद्दा बताया, तो कोर्ट ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह भावुकता केवल कुत्तों के लिए ही क्यों दिखाई देती है, उन मासूमों के लिए क्यों नहीं जो इनके हमलों का शिकार हो रहे हैं?

प्रमुख कानूनी निर्देश और पिछली सख्तियां

​सुप्रीम कोर्ट ने न केवल मुआवजे का प्रावधान किया है, बल्कि पिछले साल (7 नवंबर 2025) दिए गए अपने आदेशों की भी याद दिलाई।

कोर्ट के कड़े निर्देश:

  1. प्रतिबंधित क्षेत्र: अस्पताल, स्कूल, बस स्टैंड, स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और रेलवे स्टेशन जैसे सार्वजनिक स्थानों को ‘कुत्ता मुक्त’ (Dog-Free) जोन घोषित किया गया है।
  2. राज्य की जिम्मेदारी: स्थानीय निकायों और राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना होगा कि सार्वजनिक स्थानों पर कुत्तों का प्रवेश वर्जित हो।
  3. मुआवजा नीति: अब प्रत्येक राज्य को एक नीति बनानी होगी जिसके तहत कुत्ते के हमले के शिकार लोगों को उनकी चोट की गंभीरता या मृत्यु के आधार पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।

देशभर में कुत्तों का आतंक: एक नजर

​हाल के महीनों में गाजियाबाद, नोएडा और दिल्ली की लिफ्ट और पार्कों में पालतू और आवारा कुत्तों द्वारा बच्चों को लहूलुहान करने की कई वीडियो वायरल हुई थीं। इन घटनाओं के बाद देशभर में ‘डॉग लवर्स’ और आम निवासियों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी।

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पोटका: मकर मेलों में ‘हब्बा-डब्बा’ पर रोक लगाने की मांग, कांग्रेस ने थाना प्रभारी को सौंपा ज्ञापन

पोटका (पूर्वी सिंहभूम): झारखंड के सांस्कृतिक पर्व मकर संक्रांति (टुसू) के अवसर पर पोटका प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में आयोजित होने वाले मेलों में बड़े पैमाने पर होने वाले ‘हब्बा-डब्बा’ (जुआ) के खिलाफ कांग्रेस ने मोर्चा खोल दिया है। पूर्वी सिंहभूम जिला कांग्रेस कमिटी के सचिव जयराम हंसदा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने पोटका थाना प्रभारी को ज्ञापन सौंपकर इन अवैध गतिविधियों पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की मांग की है।

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इन गांवों में जुए का सबसे अधिक खतरा

​ज्ञापन में स्पष्ट रूप से उन क्षेत्रों को चिह्नित किया गया है जहाँ मेलों की आड़ में जुआ सिंडिकेट सक्रिय रहता है:

  • ​तिलाई टांड़ और शोहदा
  • ​मानपुर और शर्मांडा
  • ​बांसिला और तूरी
  • ​बालीडीह, बालीजुड़ी और टंगरसाई

बर्बाद हो रहे हैं मध्यम वर्गीय और मजदूर परिवार

​जयराम हंसदा ने चिंता जताते हुए कहा कि पोटका एक ग्रामीण और मजदूर बहुल क्षेत्र है। यहाँ के लोग दिन भर कड़ी मेहनत कर पैसे कमाते हैं, लेकिन मकर पर्व के दौरान लगने वाले मेलों में ‘हब्बा-डब्बा’ के जाल में फंसकर अपनी जमापूंजी गंवा देते हैं।

​”जुआ न केवल आर्थिक नुकसान पहुंचाता है, बल्कि इससे परिवारों में कलह और अपराध को बढ़ावा मिलता है। मध्यम वर्गीय परिवारों को इस दलदल से बचाना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।” — जयराम हंसदा, सचिव, जिला कांग्रेस

प्रशासनिक रुख और प्रतिनिधिमंडल

​थाना प्रभारी ने कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना और उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया है। हालांकि, ग्रामीणों का मानना है कि प्रभावी प्रतिबंध के लिए प्रशासन को मेलों के दौरान विशेष पुलिस गश्त और सख्त निगरानी सुनिश्चित करनी होगी।

प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से शामिल थे:

  • ​सौरव चटर्जी
  • ​आनंद पाल
  • ​लालटू दास
  • ​लासा मुर्मू
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‘घोटाले में भी घोटाला’: बाबूलाल मरांडी का ACB पर बड़ा हमला, शराब घोटाले की जांच को बताया ‘वसूली का खेल’

रांची: झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता बाबूलाल मरांडी ने राज्य में कथित शराब घोटाले की जांच कर रही भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) पर सनसनीखेज आरोप लगाए हैं। मरांडी ने सोशल मीडिया (X) पर सिलसिलेवार हमला बोलते हुए कहा कि राज्य में जांच के नाम पर “घोटाले में भी घोटाला” चल रहा है और एसीबी अब एक स्वतंत्र एजेंसी के बजाय ‘वसूली एजेंट’ की तरह काम कर रही है।

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मरांडी के आरोपों के मुख्य बिंदु:

​बाबूलाल मरांडी ने एसीबी की कार्यशैली पर तीन गंभीर आरोप जड़े हैं:

  1. ‘रेट’ तय करने के लिए गिरफ्तारी: मरांडी का दावा है कि आरोपियों की गिरफ्तारी का मकसद न्याय दिलाना नहीं, बल्कि उनके मन में डर पैदा कर सौदेबाजी (डील) का ‘रेट’ तय करना है।
  2. चार्जशीट में जानबूझकर देरी: उन्होंने आरोप लगाया कि जैसे ही पर्दे के पीछे से पैसे पहुंच जाते हैं, एसीबी जानबूझकर समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं करती। इसका उद्देश्य ‘बड़ी मछलियों’ (प्रभावशाली आरोपियों) को अदालत से आसानी से डिफ़ॉल्ट जमानत (Bail) दिलाने का रास्ता साफ करना है।
  3. केंद्रीय एजेंसी की मांग: मरांडी ने साफ तौर पर कहा कि अब इस मामले की निष्पक्ष जांच केवल केंद्रीय एजेंसियां (ED/CBI) ही कर सकती हैं, क्योंकि राज्य की एजेंसियां सत्ता के दबाव में खेल कर रही हैं।
  4. भाजपा का रुख: भाजपा नेताओं का कहना है कि राज्य सरकार अपनी पसंदीदा एजेंसियों के माध्यम से भ्रष्टाचार की परतों को ढंकने की कोशिश कर रही है।
  5. सत्ता पक्ष की प्रतिक्रिया: झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और कांग्रेस ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे संवैधानिक संस्थाओं की छवि धूमिल करने की कोशिश बताया है।
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झारखंड राज्य बार काउंसिल चुनाव: 1.25 लाख रुपये की जमानत राशि पर छिड़ा विवाद; वकीलों ने बताया ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘असंवैधानिक’

रांची: झारखंड राज्य बार काउंसिल के आगामी चुनावों के लिए निर्धारित की गई ‘अतार्किक’ जमानत राशि ने कानूनी गलियारों में एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। काउंसिल द्वारा नामांकन के लिए जमानत राशि को सीधे 10,000 रुपये से बढ़ाकर 1,25,000 रुपये करने के फैसले का राज्य के अधिवक्ताओं ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है।

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विरोध के मुख्य बिंदु: क्यों नाराज हैं अधिवक्ता?

​अधिवक्ताओं के एक बड़े समूह ने इस निर्णय को ‘वंचित और आर्थिक रूप से कमजोर’ वकीलों को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखने की एक सोची-समझी साजिश करार दिया है। विरोध जता रहे वकीलों के तर्क निम्नलिखित हैं:

  • लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन: वकीलों का कहना है कि जमानत राशि में 1250% की वृद्धि पूरी तरह से अव्यावहारिक और अलोकतांत्रिक है। यह फैसला योग्य लेकिन आर्थिक रूप से अक्षम अधिवक्ताओं को नेतृत्व करने से रोकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अनदेखी: अधिवक्ताओं ने हवाला दिया कि जहां माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने नए अधिवक्ताओं के एनरोलमेंट शुल्क को न्यूनतम (₹1000 से कम) रखने का निर्देश दिया है, वहीं बार काउंसिल इसके विपरीत दिशा में काम कर रही है।
  • आम सभा की सहमति का अभाव: आरोप है कि इतनी बड़ी राशि तय करने से पहले बार काउंसिल ने कोई आम सभा (General Body Meeting) आयोजित नहीं की और न ही सदस्यों की राय ली। इसे ‘मनमाना और गैर-कानूनी’ निर्णय बताया जा रहा है।

बीमारू राज्य की दुहाई और विरोधाभास

​विरोध प्रदर्शन कर रहे अधिवक्ताओं ने याद दिलाया कि झारखंड एक गरीब राज्य है। उन्होंने सरकार के उस फैसले का भी जिक्र किया जब ₹5 से ₹10 की सरकारी फीस वृद्धि पर पूरे राज्य के वकील आंदोलित हो गए थे। ऐसे में बार काउंसिल द्वारा खुद सवा लाख रुपये की फीस वसूलना एक बड़ा विरोधाभास पैदा करता है।

​”यह निर्णय झारखंड के वकीलों की आर्थिक स्थिति के साथ एक भद्दा मजाक है। बार काउंसिल को चंदा उगाही का केंद्र नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक होना चाहिए। हम इस मनमाने फैसले के खिलाफ उच्च स्तर पर हस्तक्षेप की मांग करते हैं।”

वरिष्ठ अधिवक्ता एवं प्रतिनिधि

आगे की रणनीति

​वकील समुदाय ने अब इस मामले में संबंधित अधिकारियों और न्यायिक संस्थाओं से हस्तक्षेप की अपील की है। अधिवक्ताओं का कहना है कि यदि जमानत राशि को घटाकर न्यूनतम और तर्कसंगत नहीं किया गया, तो वे इस चुनाव प्रक्रिया के बहिष्कार और कानूनी चुनौती देने पर विचार करेंगे।

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टीनप्लेट चौक पर सेवा संकल्प: विधायक पूर्णिमा साहू के सहयोग से भाजयुमो ने बांटे कंबल, जरूरतमंदों के खिले चेहरे

जमशेदपुर: लौहनगरी में जारी शीतलहर और गिरते तापमान के बीच जमशेदपुर पूर्व की विधायक पूर्णिमा साहू के मार्गदर्शन में भारतीय जनता युवा मोर्चा (भाजयुमो) गोलमुरी मंडल ने मानवता की मिसाल पेश की है। मंगलवार को गोलमुरी के व्यस्त टीनप्लेट चौक पर एक विशेष शिविर लगाकर सैकड़ों असहाय और गरीब परिवारों के बीच कंबलों का वितरण किया गया।

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प्रमुख बिंदु:

  • आयोजक: भाजयुमो गोलमुरी मंडल (अध्यक्ष नवजोत सिंह सोहल की अगुवाई में)।
  • स्थान: टीनप्लेट चौक, जमशेदपुर।
  • सहयोग: विधायक पूर्णिमा साहू (भाजपा)।
  • उद्देश्य: ‘अंत्योदय’ की भावना के साथ समाज के अंतिम व्यक्ति तक राहत पहुँचाना।

कार्यकर्ताओं का उत्साह और सेवा भाव

​कार्यक्रम के दौरान भाजयुमो कार्यकर्ताओं ने केवल कंबल ही नहीं बांटे, बल्कि सड़क किनारे और फुटपाथ पर रहने वाले लोगों के पास जाकर उनसे संवाद किया और उनकी अन्य समस्याओं की जानकारी भी ली। कड़ाके की ठंड में नया कंबल पाकर बुजुर्गों और महिलाओं के चेहरों पर राहत की मुस्कान साफ देखी गई।

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नेताओं के विचार

​”विधायक पूर्णिमा साहू जी के नेतृत्व में हमारा संकल्प है कि जमशेदपुर पूर्व विधानसभा क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति ठंड से असुरक्षित न रहे। भाजयुमो का प्रत्येक कार्यकर्ता सेवा और समर्पण के साथ इस अभियान को वार्ड स्तर तक ले जाएगा।”

नवजोत सिंह सोहल, अध्यक्ष, भाजयुमो गोलमुरी मंडल

​”यह कार्यक्रम जनसेवा के प्रति हमारे अटूट संकल्प का प्रमाण है। पूर्णिमा साहू जी के मार्गदर्शन में हम राजनीति को माध्यम बनाकर समाज के वंचित वर्गों की सेवा कर रहे हैं।”

अभिमन्यु सिंह चौहान, जिला महामंत्री, भाजयुमो

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उपस्थिति: इस अवसर पर इंद्रजीत सिंह, बलवीर सिंह फौजी, कुलविंदर सिंह, कुलवंत सिंह कांटे, अमनदीप सिंह, कुलवंत पाली, राकेश गिरी, पीयूष पॉल सहित भाजयुमो के कई समर्पित कार्यकर्ता मौजूद थे।

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आदित्यपुर: ईमली चौक पर ‘सड़क सुरक्षा’ का संदेश; नुक्कड़ नाटक और काउंसलिंग के जरिए वाहन चालकों को किया गया जागरूक

आदित्यपुर/सरायकेला: राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह-2026 (1 जनवरी से 31 जनवरी) के तहत मंगलवार को आदित्यपुर के ईमली चौक पर एक व्यापक सड़क सुरक्षा जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिला परिवहन पदाधिकारी (DTO) गिरिजा शंकर महतो के नेतृत्व में चलाए गए इस अभियान का मुख्य उद्देश्य सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाना और आम जनमानस को यातायात नियमों के प्रति संवेदनशील बनाना था।

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कार्यक्रम की मुख्य विशेषताएं

  • नुक्कड़ नाटक का मंचन: कार्यक्रम के दौरान कलाकारों ने नुक्कड़ नाटक के माध्यम से बिना हेलमेट व लाइसेंस के वाहन चलाने और असुरक्षित ड्राइविंग के गंभीर परिणामों को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया।
  • विधिक एवं दंडात्मक जानकारी: डीटीओ ने वाहन चालकों को ‘हिट एंड रन’ के नए विधिक प्रावधानों, ‘गुड समैरिटन’ (नेक मददगार) कानून और मोटरयान अधिनियम के तहत लगने वाले जुर्मानों की सरल भाषा में जानकारी दी।
  • ऑन-द-स्पॉट कार्रवाई: जागरूकता के साथ-साथ नियमों का उल्लंघन करने वाले चालकों की मौके पर ही काउंसलिंग की गई और कई वाहनों का ऑनलाइन चालान भी काटा गया।

जागरूकता रथ और सूचनात्मक प्रचार

​सड़क सुरक्षा जागरूकता वाहन (जागरूकता रथ) ने गम्हरिया और आदित्यपुर के विभिन्न रिहायशी व औद्योगिक क्षेत्रों का भ्रमण किया।

  • पंपलेट वितरण: टीम द्वारा राहगीरों और वाहन चालकों के बीच सुरक्षा नियमों और दंडात्मक प्रावधानों से संबंधित हजारों सूचनात्मक पत्रक बांटे गए।
  • ओवरलोडिंग पर लगाम: विशेष रूप से ओवरलोडेड मालवाहक वाहनों के विरुद्ध अभियान चलाकर उन्हें दुर्घटनाओं के जोखिम के प्रति आगाह किया गया।
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झारखंड-बंगाल सीमा पर रणक्षेत्र बना बराकर: बच्चों के विवाद में चलीं गोलियां, भारी पत्थरबाजी और लाठीचार्ज

बराकर/मैथन: झारखंड और पश्चिम बंगाल की सीमा पर स्थित बराकर इलाके में सोमवार को क्रिकेट के मैदान से शुरू हुआ एक मामूली विवाद भीषण सांप्रदायिक और राजनीतिक तनाव में बदल गया। खेल के दौरान बच्चों के बीच हुई कहासुनी ने देखते ही देखते हिंसक मोड़ ले लिया, जिसके बाद इलाके में गोलीबारी और जमकर पत्थरबाजी हुई। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा, जिसमें पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हुए हैं।

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खेल के मैदान से थाने तक का घटनाक्रम

​घटना की शुरुआत उस वक्त हुई जब मैदान में क्रिकेट खेल रहे बच्चों के बीच किसी बात को लेकर बहस हो गई। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में यह मामला मामूली था और दोनों पक्ष थाने भी पहुंचे, जहाँ पुलिस ने मामला शांत कराने की कोशिश की।

हिंसा की क्रोनोलॉजी:

  • विवाद की शुरुआत: बच्चों के बीच खेल-खेल में झड़प।
  • असामाजिक तत्वों का प्रवेश: जैसे ही मामला थाने से बाहर निकला, कुछ असामाजिक तत्वों ने इसे राजनीतिक और सांप्रदायिक रंग देना शुरू कर दिया।
  • गोलीबारी और पथराव: देखते ही देखते भीड़ उग्र हो गई। उपद्रवियों ने न केवल पत्थरबाजी की, बल्कि हवाई फायरिंग भी की, जिससे पूरे इलाके में दहशत फैल गई।
  • पुलिस की कार्रवाई: बेकाबू भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। जवाब में भीड़ ने पुलिस टीम पर भी पथराव किया।

भारी नुकसान और तनावपूर्ण स्थिति

​इस झड़प में दोनों ओर से कई ग्रामीणों को चोटें आई हैं। वहीं, भीड़ को शांत करने की कोशिश में कुछ पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। उपद्रवियों ने इलाके में खड़ी कुछ गाड़ियों और दुकानों को भी निशाना बनाया।

वर्तमान स्थिति:

झारखंड और बंगाल दोनों राज्यों की पुलिस सीमावर्ती इलाकों में गश्त कर रही है। इलाके में तनाव को देखते हुए अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है। पुलिस अब उन असामाजिक तत्वों की पहचान करने में जुटी है जिन्होंने बच्चों के विवाद को जानबूझकर तूल दिया और हिंसा भड़काई।

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रामगढ़: गोला वन क्षेत्र में नर जंगली हाथी का शव बरामद, इलाके में दहशत का माहौल

रामगढ़, गोला: झारखंड के रामगढ़ जिले के गोला वन क्षेत्र से एक दुखद और चिंताजनक खबर सामने आई है। मंगलवार सुबह चौपा दारू पेट्रोल पंप के समीप एक खेत में एक विशालकाय नर जंगली हाथी का मृत शरीर पाया गया। हाथी की सूंड से खून बहता देख ग्रामीणों में हड़कंप मच गया और तुरंत वन विभाग को इसकी सूचना दी गई।

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घटना का विवरण

​स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, वे सुबह जब अपने कुओं से पानी भरने और खेतों की ओर निकले, तो उन्होंने हाथी को बेसुध पड़ा देखा। एक प्रत्यक्षदर्शी महिला ने बताया, “हमने देखा कि हाथी के सूंड से खून निकल रहा था। वह हिल-डुल नहीं रहा था, जिसके बाद हमने गांव वालों को शोर मचाकर इकट्ठा किया।”

हाथी की मौत की संभावित स्थितियां:

  • सटीक कारण: फिलहाल वन विभाग ने मौत के सटीक कारण की पुष्टि नहीं की है।
  • शॉर्ट सर्किट की आशंका: क्षेत्र के कुछ लोगों ने आशंका जताई है कि खेतों के ऊपर से गुजर रहे बिजली के तारों की चपेट में आने (इलेक्ट्रोक्यूशन) से मौत हुई होगी, हालांकि अधिकारियों ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का इंतजार करने को कहा है।
  • झुंड से बिछड़ा हाथी: बताया जा रहा है कि यह हाथी पिछले कई दिनों से क्षेत्र में विचरण कर रहे हाथियों के बड़े झुंड का हिस्सा था।

इलाके में हाथियों का आतंक और ग्रामीणों का गुस्सा

​गोला और आसपास के इलाकों में हाथियों का उत्पात पिछले एक सप्ताह से काफी बढ़ गया है। ग्रामीणों में न केवल डर है, बल्कि वन विभाग के प्रति नाराजगी भी देखी जा रही है।

  • फसलों का नुकसान: एक सप्ताह पहले इसी क्षेत्र में हाथियों ने कई एकड़ में लगी फसल को रौंद दिया था।
  • घरों की क्षति: हाल ही में हाथियों के झुंड ने एक ग्रामीण के घर को भी क्षतिग्रस्त कर दिया था, जिससे परिवार बेघर हो गया।
  • दहशत में जीवन: लोग रात-रात भर जागकर मशाल जलाकर अपने घरों की रक्षा कर रहे हैं।

वन विभाग की कार्रवाई

​सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और शव को अपने कब्जे में लिया।

​”हाथी के शव को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है। डॉक्टरों की टीम पोस्टमार्टम करेगी, जिससे यह साफ हो पाएगा कि मौत प्राकृतिक है, किसी दुर्घटना का परिणाम है या कोई अन्य साजिश। हम हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर ड्रोन और पेट्रोलिंग टीम के जरिए नजर रख रहे हैं।” – वन विभाग अधिकारी

​झारखंड में हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ता यह संघर्ष (Human-Elephant Conflict) एक गंभीर समस्या बन चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि कॉरिडोर का कम होना और जंगलों में भोजन की कमी हाथियों को बस्तियों की ओर धकेल रही है।

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