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तृणमूल के बागी गुट का बड़ा दांव: सुदीप बंदोपाध्याय ने जिस NCPI में विलय की घोषणा की, उसकी बैलेंस शीट में मात्र ₹75; खड़े हुए बड़े कानूनी सवाल

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कोलकाता:

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी गुट के प्रमुख नेता सुदीप बंदोपाध्याय ने पत्रकारों से बात करते हुए एक चौंकाने वाला एलान किया है। उन्होंने घोषणा की है कि उनका पूरा बागी गुट ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी’ में शामिल हो गया है और दोनों धड़ों का विलय हो चुका है।logo

​सुदीप बंदोपाध्याय ने दावा किया कि यह एक मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय (Regional) पार्टी है। हालांकि, इस घोषणा के तुरंत बाद उन्होंने एक विरोधाभासी बयान भी दिया। बंदोपाध्याय ने कहा कि वे खुद को ही ‘असली तृणमूल’ बताएंगे और असली-नकली का फैसला अदालत के दरवाजे पर होगा। दूसरी ओर, बागी गुट की एक और प्रमुख नेता शताब्दी रॉय के बयानों में भी यही दुविधा साफ दिखी; उन्होंने कहा कि वे तृणमूल के मूल सिंबल (चुनाव चिह्न) पर दावा नहीं करेंगी, लेकिन अंतिम फैसला विधानसभा स्पीकर पर छोड़ती हैं।

​पार्टी का नाम लेने में दिखे असहज, सामने आई बड़ी गड़बड़ी

​प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सुदीप बंदोपाध्याय ‘नेशनल‍िस्‍ट स‍िटिजंस पार्टी’ का नाम लेते वक्त काफी असहज दिखे और नाम को लेकर संघर्ष करते नजर आए। उन्होंने इसे ‘मान्यता प्राप्त क्षेत्रीय दल’ बताया, जबकि चुनाव आयोग (ECI) के रिकॉर्ड के मुताबिक, इस नाम की पार्टी पूरी तरह से ‘गैर-मान्यता प्राप्त’ (Unrecognized) श्रेणी में आती है। ऐसी पार्टियों के पास कोई निश्चित और स्थायी चुनाव चिह्न नहीं होता है।b 1

​सबसे दिलचस्प बात यह है कि अभी तक इस कथित मुख्य पार्टी (NCPI) की तरफ से कोई भी पदाधिकारी सामने नहीं आया है। इस संगठन का मुखिया कौन है, इसका वास्तविक ढांचा क्या है और क्या इस पार्टी को इस विलय की भनक भी है या नहीं—इसे लेकर स्थिति पूरी तरह धुंधली है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस जल्दबाजी में किए गए विलय के कारण बागी गुट और उन्हें परोक्ष रूप से समर्थन दे रही भाजपा के लिए आगे की राह कानूनी अड़चनों से भरी हो सकती है।

​खोजी पड़ताल: ₹75 के बैलेंस वाली पार्टी बनी बागी गुट की ढाल!

​पश्चिम बंगाल के चीफ इलेक्शनेरल ऑफिसर (CEO) की आधिकारिक वेबसाइट पर मौजूद ‘नेशनलिस्ट सिटीजंस पार्टी ऑफ इंडिया’ (NCPI) के दस्तावेज़ कई हैरान करने वाले खुलासे करते हैं।

​वित्त वर्ष 2022-2023 की ऑडिट रिपोर्ट और फॉर्म 24A (जो टैक्स छूट के लिए चंदों का ब्योरा होता है) के अनुसार:

  • पंजीकरण और पता: इस पार्टी का रजिस्ट्रेशन 20 जनवरी 2023 को हुआ था और इसका पंजीकृत पता हावड़ा, पश्चिम बंगाल दर्ज है।
  • बैलेंस शीट की हकीकत: 31 मार्च 2023 को समाप्त हुए वित्त वर्ष के बाद इस पूरी राजनीतिक पार्टी के खाते में मात्र 75 रुपये का कैश बैलेंस बचा था।
  • चुनावी इतिहास: पार्टी ने जनवरी 2023 में पंजीकरण कराया और चंदे के जरिए कुल 1,13,075 रुपये जुटाए। इसमें से 10,000 रुपये रजिस्ट्रेशन फीस और 49,400 रुपये त्रिपुरा चुनाव फीस में जमा किए गए। पार्टी ने फरवरी 2023 में त्रिपुरा की दो सीटों (चौमानू और कैलाशहर) पर चुनाव भी लड़ा, जहां दोनों उम्मीदवारों (बरजेड़ा और जहांगीर अली) की जमानत जब्त हो गई और उन्हें क्रमशः केवल 536 और 286 वोट मिले।a 2

​कानून की अनदेखी: बिना PAN के लिया कैश डोनेशन, खुद का चंदा और खुद की मुहर

​पार्टी के वित्तीय दस्तावेजों में नियमों के उल्लंघन का एक गंभीर पैटर्न भी दिखाई देता है:

  1. कैश डोनेशन का उल्लंघन: साल 2017 के सरकारी नियमों के मुताबिक कोई भी राजनीतिक दल 2,000 रुपये से ज्यादा का चंदा कैश (नकद) में नहीं ले सकता। लेकिन NCPI ने बकायदा लिखित डिक्लेरेशन दिया है कि उसने अपने सभी चंदे कैश में स्वीकार किए हैं।
  2. PAN कार्ड नदारद: फॉर्म 24A में चंदा देने वाले किसी भी व्यक्ति का पैन (PAN) नंबर दर्ज नहीं है।
  3. हितों का टकराव (Conflict of Interest): फॉर्म 24A पर पार्टी की अध्यक्ष के रूप में ‘शेवली कुंडू’ के हस्ताक्षर हैं। इसी फॉर्म में 8वें नंबर पर चंदा देने वालों में भी उनका ही नाम दर्ज है। इसके अलावा, 7वें नंबर पर चंदा देने वाले बिभूति भूषण साहा हैं, जिन्हें वेरिफिकेशन घोषणा में शेवली कुंडू का पिता बताया गया है। यानी, अध्यक्ष और उनके पिता ने मिलकर पार्टी को 30,000 रुपये का चंदा दिया और अध्यक्ष के नाते उन्होंने खुद ही इसे प्रमाणित कर मुहर लगा दी।

निष्कर्ष:

ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भले ही इस वक्त बगावत के संकट से घिरी नजर आ रही हो, लेकिन बागियों का यह नया ठिकाना खुद कानूनी और प्रक्रियात्मक विवादों के घेरे में है। मात्र 75 रुपये की वित्तीय हैसियत और नियमों के उल्लंघन के आरोपों से घिरी एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी को ढाल बनाकर बागी गुट अपनी विधानसभा सदस्यता बचा पाएगा या नहीं, यह आने वाले दिनों में कोर्ट और विधानसभा अध्यक्ष के फैसले से साफ होगा।

– तीसरी धारा न्यूज

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