तीसरी धारा न्यूज
7 अगस्त 2026, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क:
भारतीय राजनीति और न्याय व्यवस्था में करीब चार दशकों तक सबसे चर्चित और विवादित विषयों में से एक रहे ‘बोफोर्स घोटाले’ का आखिरकार पूर्ण रूप से कानूनी अंत हो गया है। सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) ने वर्ष 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अंतिम लंबित याचिका को खारिज कर दिया है।
अदालत के इस फैसले के साथ ही हिंदुजा बंधुओं और स्वीडिश हथियार निर्माता कंपनी एबी बोफोर्स (AB Bofors) से जुड़े इस मामले को दोबारा खोलने की तमाम कोशिशों पर पूरी तरह विराम लग गया है। शीर्ष अदालत की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए इतने लंबे अंतराल के बाद मामले में आगे की सुनवाई की औचित्यहीनता पर सवाल उठाया। इस निर्णय के साथ ही बोफोर्स केस की फाइल हमेशा के लिए बंद होकर इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई है।
क्या था बोफोर्स समझौता और विवाद?
बोफोर्स विवाद की नींव 24 मार्च 1986 को रखी गई थी, जब तत्कालीन भारत सरकार ने स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के साथ 155 एमएम की 400 हॉवित्जर तोपों की खरीद के लिए लगभग 1,437 करोड़ रुपये का करार किया था।
हालांकि, इसके अगले ही वर्ष 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया। रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस रक्षा सौदे को हासिल करने के लिए कंपनी ने भारत के शीर्ष राजनीतिज्ञों और रक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों को करीब 64 करोड़ रुपये की अवैध दलाली (रिश्वत) दी थी।
जिसने हिला दी थी राजीव गांधी सरकार की नींव
स्वीडिश रेडियो के खुलासे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी सरकार सीधे तौर पर विपक्ष के निशाने पर आ गई। इस राजनीतिक घमासान के बीच तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह (वीपी सिंह) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
बोफोर्स के मुद्दे ने 1989 के आम चुनावों में केंद्रीय भूमिका निभाई, जिसके परिणामस्वरूप कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी और वीपी सिंह देश के प्रधानमंत्री बने। यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी सहित कई प्रमुख हस्तियों पर आरोप लगे, लेकिन जांच एजेंसियां अदालत में इन आरोपों को साबित करने वाले पर्याप्त सबूत पेश नहीं कर सकीं।
2005 में ही हाईकोर्ट से मिली थी राहत
मामले की जांच सीबीआई ने जनवरी 1990 में प्राथमिकी दर्ज कर शुरू की थी। लगभग एक दशक की लंबी जांच के बाद 1999 में चार्जशीट दाखिल की गई। हालांकि, 31 मई 2005 को दिल्ली हाईकोर्ट ने हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी के खिलाफ जारी सभी आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया था कि अभियोजन पक्ष के पास आरोपों को सिद्ध करने के लिए कोई ठोस आधार या सबूत मौजूद नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और अंतिम निर्णय
दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ सीबीआई ने भी 2018 में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, लेकिन शीर्ष अदालत ने 4,522 दिनों की अत्यधिक देरी का पर्याप्त कारण न होने के आधार पर अपील को खारिज कर दिया था।
अब, सीबीआई और अन्य पक्षों की ओर से केस को दोबारा पुनर्जीवित करने की अंतिम कानूनी कोशिश भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज कर दी गई है। चार दशकों तक देश की राजनीति, रक्षा सौदों की पारदर्शिता और सत्ता की जवाबदेही पर बहस का केंद्र रहा यह मामला अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो चुका है।
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