रांची | 31 जनवरी, 2026: झारखंड की सियासत में इन दिनों नगर निकाय चुनावों की तपिश विधानसभा और लोकसभा चुनाव जैसी महसूस की जा रही है। राज्य के 48 नगर निकायों में 23 फरवरी को होने वाले मतदान के लिए नामांकन की प्रक्रिया (29 जनवरी – 4 फरवरी) जारी है। हालांकि चुनाव तकनीकी रूप से दलीय आधार पर नहीं हो रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों ने ही अपने-अपने ‘समर्थित’ योद्धाओं को मैदान में उतारने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है।

प्रमुख दलों की रणनीति: पर्दे के पीछे से असली खेल
| राजनीतिक दल | मुख्य रणनीति | ताज़ा स्थिति |
|---|---|---|
| भाजपा | ‘राष्ट्रवादी’ उम्मीदवारों को आंतरिक समर्थन | शनिवार को कोर ग्रुप की बैठक में नाम फाइनल होंगे। मधु कोड़ा और अर्जुन मुंडा की सक्रियता बढ़ी। |
| कांग्रेस | जिला स्तर से फीडबैक और गठबंधन समन्वय | 1 फरवरी तक जिला अध्यक्षों से सूची मांगी गई है। रांची मेयर पद पर दावा। |
| राजद | गठबंधन की एकजुटता और ‘बैकअप’ रोल | अधिकांश सीटों पर JMM और कांग्रेस को समर्थन; खुद उम्मीदवार नहीं उतारेगी। |
| JMM | सरकार की लोकप्रियता का लिटमस टेस्ट | मुख्यमंत्री |
भाजपा: बिना सिंबल, पर ‘कमांड’ के साथ
भाजपा ने स्पष्ट किया है कि वह आधिकारिक तौर पर नाम घोषित नहीं करेगी, लेकिन हर निकाय में ‘राष्ट्रवादी’ और ‘भ्रष्टाचार-मुक्त’ छवि वाले उम्मीदवारों को चिन्हित कर उन्हें पार्टी का पूर्ण आंतरिक सहयोग देगी। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और सांसद दीपक प्रकाश ने साफ किया है कि पार्टी विकास-उन्मुख उम्मीदवारों के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करेगी।
महागठबंधन: एकजुटता की चुनौती
कांग्रेस और JMM के बीच रांची जैसे बड़े शहरों में मेयर पद को लेकर खींचतान की खबरें आ रही हैं। कांग्रेस ने 30 सीटों पर अपने दावेदारों को उतारने का मन बनाया है, वहीं राजद ने गठबंधन की मर्यादा रखते हुए पीछे हटने का फैसला किया है।
चुनाव से जुड़ी मुख्य जानकारियां
- कुल निकाय: 48 (9 नगर निगम समेत)
- मतदान तिथि: 23 फरवरी, 2026
- मतगणना: 27 फरवरी, 2026
- मतदाता संख्या: 43.33 लाख (लगभग)
- विशेष: पहली बार OBC आरक्षण लागू। मेयर और अध्यक्ष का चुनाव सीधा (Direct) होगा, जबकि डिप्टी मेयर/उपाध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष।
विवाद का केंद्र: बैलेट पेपर बनाम EVM
राज्य निर्वाचन आयुक्त अलका तिवारी के अनुसार, इस बार चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएंगे। भाजपा ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है, इसे “सत्ता का दुरुपयोग” और “पुरानी व्यवस्था की ओर वापसी” करार दिया है। वहीं, सत्ताधारी दलों ने इसे जमीनी लोकतंत्र की पारदर्शी प्रक्रिया बताया है।
निष्कर्ष: 2026 की सियासी दिशा
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यह चुनाव केवल शहरों की साफ-सफाई या सड़कों का नहीं है, बल्कि हेमंत सोरेन सरकार की लोकप्रियता का वास्तविक ‘टेस्ट’ है। निर्दलीय उम्मीदवारों के रूप में पार्टी बागियों का विद्रोह दोनों ही खेमों की नींद उड़ा रहा है।











