नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में प्रजनन अधिकारों और मानवीय संवेदनाओं को सर्वोपरि रखते हुए एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने कोमा जैसी स्थिति में अस्पताल में भर्ती एक सेना के जवान की पत्नी को IVF (इन-विट्रो फर्टिलाइजेशन) प्रक्रिया जारी रखने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी स्थिति में पति की पहले दी गई सहमति को ही वैध माना जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
जस्टिस पुरुशेंद्र कुमार कौरव की बेंच ने यह फैसला जवान की पत्नी द्वारा दायर याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता के अनुसार:
- जून 2023: दंपति ने आपसी सहमति से संतान प्राप्ति के लिए IVF प्रक्रिया शुरू करने का निर्णय लिया था।
- जुलाई 2025: गश्त के दौरान ऊंचाई से गिरने के कारण जवान के सिर में गंभीर चोट (ट्रॉमेटिक ब्रेन इंजरी) आई, जिसके बाद से वह कोमा जैसी स्थिति में सेना के अस्पताल में भर्ती हैं।
- अवरोध: पति की शारीरिक स्थिति को देखते हुए अस्पताल ने IVF प्रक्रिया रोक दी थी, जिसके खिलाफ पत्नी ने अदालत का दरवाजा खटखटाया।

अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
कोर्ट ने अपने 13 अप्रैल के फैसले में असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (ART) विनियमन अधिनियम की व्याख्या करते हुए कई अहम बातें कहीं:
- पूर्व सहमति ही पर्याप्त: कोर्ट ने कहा कि जब प्रक्रिया शुरू हुई थी, तब जवान ने अपनी सहमति दी थी। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे लगे कि पति की मंशा बदल गई थी।
- प्रजनन स्वायत्तता एक मौलिक अधिकार: जस्टिस कौरव ने जोर देकर कहा कि संविधान के तहत मातृत्व, गरिमा और प्रजनन संबंधी स्वायत्तता का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। किसी भी कानूनी प्रक्रिया की व्याख्या इस अधिकार को बढ़ावा देने के लिए होनी चाहिए, न कि इसे बाधित करने के लिए।
- कठोर नियमों से ऊपर न्याय: अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल प्रक्रियात्मक नियमों के कठोर पालन के लिए कानून के मूल उद्देश्य को नष्ट नहीं किया जा सकता। यदि प्रक्रिया पूरी नहीं करने दी जाती, तो पति की पहले दी गई सहमति व्यर्थ हो जाती।
श्रीमद्भागवत पुराण का उल्लेख
फैसले के दौरान अदालत ने आध्यात्मिक और दार्शनिक पहलू को भी छुआ। भागवत पुराण का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
”एक जीवित प्राणी को दैव (भाग्य) की देखरेख में शरीर प्राप्त होता है। किसी को माता-पिता बनने का सौभाग्य मिलेगा या नहीं, यह अंततः नियति ही तय करती है, इंसान नहीं।”
निष्कर्ष
अदालत ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे IVF प्रक्रिया को उसके तार्किक निष्कर्ष तक ले जाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं और पति के जेनेटिक मटीरियल को सुरक्षित रखें। यह फैसला उन परिवारों के लिए एक नई उम्मीद बनकर उभरा है जो कानूनी पेचीदगियों के कारण अपने प्रजनन अधिकारों से वंचित रह जाते हैं।
रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज डेस्क










