एक नई सोच, एक नई धारा

पहले G-23, फिर शशि थरूर और अब दिग्विजय सिंह को कांग्रेस में क्या खल रहा है?

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कांग्रेस पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठनात्मक ढांचे और निर्णय प्रक्रिया को लेकर असंतोष एक बार फिर खुलकर सामने आया है. पहले G-23 समूह ने संगठनात्मक सुधारों की मांग उठाई थी, इसके बाद सांसद शशि थरूर ने आंतरिक लोकतंत्र और विचारों की विविधता पर सवाल खड़े किए और अब वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह की हालिया टिप्पणियों ने पार्टी में जारी अंतर्कलह को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है.

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बता दें, वर्ष 2020 में सामने आए G-23 समूह ने तत्कालीन अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखकर संगठनात्मक चुनाव, सामूहिक नेतृत्व और जमीनी स्तर पर पार्टी को मजबूत करने की मांग की थी. इसके बाद शशि थरूर ने कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ते हुए पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जरूरत पर जोर दिया और हाल के महीनों में रणनीति व संवाद शैली को लेकर भी असहमति जताई.

अब दिग्विजय सिंह के सोशल मीडिया पोस्ट ने कांग्रेस में हलचल मचा दी है. दिल्ली में कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक के दौरान मनरेगा का नाम बदलने के प्रस्ताव के विरोध की रणनीति पर चर्चा हो रही थी उसी समय दिग्विजय सिंह ने पार्टी संगठन में विकेंद्रीकरण और बड़े बदलावों की जरूरत बताते हुए राहुल गांधी को सीधे संबोधित किया. उन्होंने लिखा कि जैसे देश में चुनाव आयोग में सुधार की आवश्यकता है, वैसे ही कांग्रेस संगठन में भी व्यापक सुधार जरूरी हैं और सबसे बड़ी दिक्कत राहुल गांधी को मनाने की है.

आरएसएस-बीजेपी की दिग्विजय सिंह ने की तारीफ

इसके बाद 27 दिसंबर को दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के साथ आरएसएस-बीजेपी संगठन की कार्यसंस्कृति की तारीफ करते हुए एक और पोस्ट किया. उन्होंने कहा कि भाजपा में जमीनी स्तर का कार्यकर्ता भी आगे बढ़कर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बन सकता है. इस बयान को कांग्रेस की आंतरिक संस्कृति और नेतृत्व शैली पर सीधा प्रहार माना जा रहा है. दिग्विजय सिंह की इन टिप्पणियों के बाद कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक कमजोरियों पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है. पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि उन्होंने कोई नई बात नहीं कही, लेकिन पहली बार इस असंतोष को सार्वजनिक रूप से सामने रखा गया है. इससे संकेत मिलता है कि पार्टी के भीतर लंबे समय से दबे मुद्दे अब खुलकर सामने आ रहे हैं.

राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि दिग्विजय सिंह अपने राजनीतिक भविष्य से अधिक अपने बेटे जयवर्धन सिंह के भविष्य को लेकर चिंतित हो सकते हैं. समर्थकों का कहना है कि उनका जोर सत्ता और अधिकार के विकेंद्रीकरण पर है ताकि संगठनात्मक ढांचा मजबूत हो सके. वहीं, विश्लेषकों का मानना है कि अगले वर्ष दिग्विजय सिंह का राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होना भी उनकी मुखरता का एक कारण हो सकता है. इन घटनाक्रमों के बीच कांग्रेस नेतृत्व का कहना है कि आंतरिक मतभेद किसी भी बड़े राजनीतिक दल में स्वाभाविक होते हैं. हालांकि, पार्टी के सामने यह सवाल अब और तीखा हो गया है कि संगठनात्मक सुधारों की शुरुआत कहां से होगी और इस पर राहुल गांधी तथा पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे क्या रुख अपनाते हैं.