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राजधानी की ‘लाइफलाइन’ खुद वेंटिलेटर पर: पीले निशान के भरोसे सिटी बस, यात्री बेहाल

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रांची: स्मार्ट सिटी का दम भरने वाली राजधानी में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की रीढ़ कही जाने वाली सिटी बस सेवा खुद अव्यवस्था के भंवर में फंसी है। शहर की सड़कों पर दौड़ती बसें यात्रियों को मंजिल तक तो पहुँचा रही हैं, लेकिन सफर की शुरुआत और इंतजार का अनुभव किसी सजा से कम नहीं है। आलम यह है कि करोड़ों के राजस्व के बावजूद यात्रियों के लिए एक ढंग का बस स्टॉपेज तक नसीब नहीं है।n7060549101774524467488fb5b1dc7d98ae8ee756633cc5f3e38c8037ca9af12aa67d246d2c20d1baa9a93

स्टॉपेज के नाम पर सिर्फ ‘पीला पेंट’, सुविधाओं के नाम पर शून्य

​शहर के मुख्य मार्गों पर बस स्टॉपेज की हकीकत बेहद डरावनी है। अधिकतर जगहों पर नगर निगम ने सड़क किनारे सिर्फ पीले रंग का निशान बनाकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली है।

  • न शेड, न बेंच: चिलचिलाती धूप, मूसलाधार बारिश या उड़ती धूल के बीच यात्री खुले आसमान के नीचे बस का इंतजार करने को मजबूर हैं।
  • बुनियादी सुविधाओं का अभाव: पीने के पानी, रोशनी या बैठने की व्यवस्था तो दूर की बात है, कई जगहों पर तो यह पता लगाना भी मुश्किल है कि बस कहाँ रुकेगी।

जहाँ दिखी सवारी, वहीं लगा दिए ब्रेक: दुर्घटना को दावत

​सुनियोजित स्टॉपेज न होने का खामियाजा सड़क पर चल रहे अन्य वाहन चालकों को भुगतना पड़ता है। सिटी बस के चालक मेन रोड, लालपुर, डोरंडा, कांटाटोली और बिरसा चौक जैसे व्यस्त इलाकों में कहीं भी बस रोक देते हैं।

अराजकता का मंजर: पीछे से आ रहे वाहनों को अचानक ब्रेक मारना पड़ता है, जिससे न केवल ट्रैफिक जाम लगता है, बल्कि गंभीर दुर्घटनाओं की आशंका भी बनी रहती है। पीक ऑवर्स में यह समस्या नासूर बन जाती है।

 

रिस्क जोन में तब्दील हुए वेटिंग स्पॉट

​जो इक्का-दुक्का बस स्टॉपेज बने भी हैं, वे अब ‘सेफ्टी डेंजर जोन’ बन चुके हैं।

  • सुरक्षा का संकट: सीसीटीवी कैमरों और स्ट्रीट लाइट की कमी के कारण रात के समय महिलाएं और छात्राएं असुरक्षित महसूस करती हैं।
  • जर्जर हालत: कई स्टॉपेज टूट कर गिरने की कगार पर हैं, जहाँ असामाजिक तत्वों का जमावड़ा लगा रहता है।
  • स्कूली बच्चों की आफत: स्कूल बस और सिटी बस का इंतजार कर रहे बच्चों को सड़क के बिल्कुल किनारे खड़ा होना पड़ता है, जो उनकी जान के लिए जोखिम भरा है।

निगम की तिजोरी भर रही, जनता की जेब और जान खतरे में

​हैरानी की बात यह है कि नगर निगम इन बस स्टॉपेज पर लगे विज्ञापनों से मोटा राजस्व वसूल रहा है। एजेंसियां विज्ञापन लगाकर कमाई कर रही हैं, लेकिन यात्रियों की सुविधाओं के लिए एक ईंट तक नहीं जोड़ी जा रही।

  • कागजी योजनाएं: परिवहन विभाग और नगर निगम के बीच समन्वय की कमी के कारण बस स्टॉपेज को आधुनिक बनाने की योजनाएं फाइलों में ही दफन हैं।

जनता की आवाज (Public Feedback)

  • “सिटी में बस स्टॉप और डिजिटल टाइमिंग बहुत जरूरी है, व्यवस्था सुधरनी चाहिए।”राकेश
  • “सड़क किनारे खड़े होकर इंतजार करना पड़ता है, सेफ्टी की भारी कमी है।”निधि रानी

तीसरी धारा न्यूज का सवाल:

​क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? क्या स्मार्ट सिटी का सपना सिर्फ विज्ञापनों तक सीमित रहेगा या यात्रियों को उनके मौलिक अधिकार (सुरक्षित सफर और सुविधा) मिलेंगे?

रिपोर्ट: डेस्क, तीसरी धारा न्यूज

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