जमशेदपुर:
पूर्वी सिंहभूम जिला मुख्यालय स्थित जमशेदपुर सदर अस्पताल इन दिनों खुद ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आ रहा है। अस्पताल में बदइंतजामी, डॉक्टरों की लापरवाही और प्रशासनिक स्तर पर मचे भारी गोलमाल के कारण गरीब मरीजों की जान आफत में है। ताजा मामला रविवार की रात का है, जहाँ फेब्रिकेटेड वार्ड में समय पर मुकम्मल इलाज न मिलने के कारण एक महिला मरीज आशिता नंदी की तड़प-तड़प कर मौत हो गई।
मरीज की मौत के बाद आक्रोशित परिजनों ने अस्पताल परिसर में जमकर हंगामा किया और प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए। परिजनों का सीधा सवाल था कि जब यहाँ इलाज की बुनियादी सुविधाएं ही नहीं थीं, तो मरीज को फेब्रिकेटेड वार्ड में क्यों शिफ्ट किया गया?
गायब रहते हैं डॉक्टर, बीते एक हफ्ते में 3 की मौत!
परिजनों के अनुसार, रविवार रात को वार्ड में आयुष चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. राजेश की ड्यूटी थी, लेकिन वे अपनी सेवा से गायब थे। इससे पहले 6 जून की रात को भी इमरजेंसी वार्ड में डॉक्टरों के न होने पर मरीजों ने भारी हंगामा किया था, उस वक्त डॉ. अभिषेक ऑन-ड्यूटी होने के बावजूद नदारद थे।
मीडिया सूत्रों का दावा है कि सदर अस्पताल में सही इलाज और संसाधनों के अभाव में बीते एक सप्ताह के भीतर 3 मरीजों की जान जा चुकी है, लेकिन हर बार मामलों को सामान्य बताकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है।
योग्यता दरकिनार: कंप्यूटर ऑपरेटर संभाल रहा ‘हॉस्पिटल मैनेजर’ की कमान
अस्पताल के भीतर चल रहे भाई-भतीजावाद का आलम यह है कि सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने नियमों को ताक पर रखकर अपने चहेते कंप्यूटर सहायक विमल कुमार मंडल को फेब्रिकेटेड वार्ड की पूरी ऑपरेशनल जिम्मेदारी (बतौर हॉस्पिटल मैनेजर) सौंप दी है। बिना किसी तकनीकी योग्यता और पर्याप्त अनुभव के एक कंप्यूटर ऑपरेटर को इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद अब पूरी व्यवस्था और सिविल सर्जन की कार्यशैली सवालों के घेरे में है।
बदहाली की मुख्य कड़ियां: कहाँ-कहाँ है लापरवाही?
- आयुष डॉक्टरों के भरोसे ICU: अस्पताल का अति-संवेदनशील आईसीयू (ICU) और फेब्रिकेटेड वार्ड विशेषज्ञ डॉक्टरों के बजाय आयुष चिकित्सकों के भरोसे चल रहा है।
- डायलिसिस वार्ड हुआ बंद: डॉक्टर और डायलिसिस टेक्नीशियन की कमी के कारण जीवनदायिनी डायलिसिस सेवा पूरी तरह ठप हो चुकी है।
- दवा और उपकरणों का अकाल: ऑपरेशन थिएटर (OT) समेत कई विभागों में जीवन रक्षक दवाओं की भारी किल्लत है। डॉक्टरों को मास्क और हैंड ग्लव्स जैसे छोटे और सामान्य उपकरण तक नसीब नहीं हो रहे हैं।
- केवल ‘आयुष्मान’ के पैसे पर फोकस: जानकारों का आरोप है कि डॉक्टरों और कर्मचारियों की पूरी टीम का मुख्य ध्यान मरीजों के इलाज से ज्यादा आयुष्मान भारत योजना के तहत आने वाले फंड को भुनाने पर टिका रहता है।
- दिखावे का उद्घाटन: एक तरफ आईसीयू और वार्ड खाली पड़े हैं, वहीं दूसरी तरफ सिविल सर्जन ने हाल ही में नए एचडीयू (HDU) वार्ड का उद्घाटन कर दिया है, जिसके संचालन को लेकर अभी से संशय बरकरार है।
दवा खरीद और DPC बहाली में बड़े घोटाले की बू, स्वास्थ्य मंत्री के संरक्षण का आरोप!
सदर अस्पताल केवल चिकित्सा के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक मोर्चे पर भी भ्रष्टाचार का केंद्र बनता जा रहा है। हाल ही में दवा खरीद में बड़े पैमाने पर वित्तीय हेराफेरी की शिकायत सामने आई थी। चौंकाने वाली बात यह है कि इस घोटाले की जांच के लिए जो कमेटी बनाई गई, उसमें खुद आरोपी सिविल सर्जन को ही शामिल कर लिया गया, जिससे जांच की मंशा पर साफ तौर पर पानी फिरता दिख रहा है। मीडिया में उठी आवाजों के बाद भी इस पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
15 सालों में सबसे खराब स्थिति
विभागीय जानकारों का कहना है कि वर्तमान सिविल सर्जन को सिर्फ स्वास्थ्य मंत्री की नजदीकी का फायदा मिल रहा है। राजनीतिक रसूख के कारण ही उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती, जबकि पिछले 15 वर्षों में सदर अस्पताल की इतनी बदतर स्थिति कभी नहीं हुई थी।
फर्जी सर्टिफिकेट पर बहाली का अनोखा कारनामा
भ्रष्टाचार का सबसे नायाब उदाहरण झारखंड स्टेट आरोग्य सोसाइटी के अंतर्गत दिसंबर 2025 में हुई DPC (डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर) की बहाली में देखने को मिला। चयनित उम्मीदवार डॉ. अंकित कुमार के अनुभव प्रमाण पत्र (Experience Certificate) को संबंधित कंपनी ने 23 दिसंबर 2025 को ही ईमेल भेजकर ‘फेक’ (फर्जी) करार दे दिया था।
इसके बावजूद, 8 जनवरी 2026 को सिविल सर्जन ने डॉ. अंकित को जॉइनिंग लेटर जारी कर दिया। मामला तब फंसा जब सिविल सर्जन ने राज्य सोसाइटी से वेतन की मांग की। सोसाइटी ने सर्टिफिकेट पर आपत्ति जताते हुए स्पष्टीकरण मांग लिया। हालांकि 24 अप्रैल 2026 को सिविल सर्जन ने तमाम फर्जी दस्तावेजों को सही बताते हुए वेतन जारी करने की पैरवी की, लेकिन सोसाइटी ने फंड रोक दिया। नतीजतन, फरवरी से बिना वेतन काम कर रहे DPC ने अब दफ्तर आना छोड़ दिया है। मीडिया सूत्रों के अनुसार, यहाँ हुई हेल्थ एडवाइजर की बहाली का भी यही हाल है, जो पूरी तरह विवादों में है।
स्वास्थ्य मंत्री से हस्तक्षेप की मांग
सदर अस्पताल की इस चौपट हो चुकी व्यवस्था को देखते हुए अब शहर के सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों ने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री से तुरंत इस मामले में हस्तक्षेप करने की मांग की है। लोगों का कहना है कि जब तक सिविल सर्जन स्तर पर बड़ा प्रशासनिक बदलाव नहीं किया जाता, तब तक जमशेदपुर की गरीब जनता को मुकम्मल इलाज मिलना नामुमकिन है।
रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज










