रांची:
झारखंड में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया से जूझ रहे मासूमों का भविष्य अंधकार में नजर आ रहा है। राज्य के लगभग 50 बच्चे बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) के लिए पूरी तरह तैयार हैं, लेकिन सरकारी फाइलें आगे न बढ़ने के कारण उनका इलाज अधर में लटका है। डॉक्टरों के अनुसार, इन बच्चों के पास समय बेहद कम है, क्योंकि ट्रांसप्लांट एक निश्चित उम्र और शारीरिक स्थिति में ही सफल हो पाता है।
विधानसभा में हुआ था 15 लाख की मदद का वादा
गौरतलब है कि पिछले साल 9 दिसंबर 2025 को विधानसभा सत्र के दौरान स्वास्थ्य मंत्री ने विधायक प्रदीप यादव के प्रस्ताव पर एक बड़ी घोषणा की थी। सरकार ने आश्वासन दिया था कि प्रत्येक थैलेसीमिया पीड़ित मरीज को बोन मैरो ट्रांसप्लांट के लिए 15 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। लेकिन इस घोषणा के तीन महीने बीत जाने के बाद भी धरातल पर कोई ठोस पहल नहीं दिखी है।
सदर अस्पताल की यूनिट: फाइलों में दबी तैयारी
रांची के सदर अस्पताल में बोन मैरो ट्रांसप्लांट यूनिट खोलने की योजना लंबे समय से पाइपलाइन में है। सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार का कहना है कि काम जारी है, लेकिन हकीकत यह है कि सुविधा शुरू न होने के कारण गरीब परिवारों को मजबूरन राज्य के बाहर महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है।
दवाओं की किल्लत ने बढ़ाया आर्थिक बोझ
सिर्फ ट्रांसप्लांट ही नहीं, इन बच्चों के लिए जीवनरक्षक मानी जाने वाली आयरन कंट्रोल की दवाएं भी सदर अस्पताल से नदारद हैं।
- दैनिक जरूरत: एक मरीज को दिन में करीब 6 टैबलेट लेनी होती हैं।
- असर: अस्पताल में दवा न होने के कारण परिजनों को बाहर से महंगे दामों पर दवा खरीदनी पड़ रही है, जो कई गरीब परिवारों की पहुंच से बाहर है।
संगठनों ने खोला मोर्चा
’लहू बोलेगा’ रक्तदान संगठन और ‘झारखंड थैलेसीमिया पीड़ित एसोसिएशन’ ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। संगठन के संस्थापक नदीम खान ने मांग की है कि:
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- घोषित 15 लाख की सहायता राशि तुरंत जारी की जाए।
- अस्पतालों में आयरन कंट्रोल की दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जाएं।
- सदर अस्पताल की बीएमटी (BMT) यूनिट को युद्धस्तर पर शुरू किया जाए।
तीसरी धारा न्यूज की टिप्पणी: सरकार की देरी इन मासूमों के लिए जानलेवा साबित हो सकती है। हर गुजरता दिन इन 50 बच्चों के लिए ‘जीवन और मृत्यु’ के बीच की लकीर को धुंधला कर रहा है।
तीसरी धारा न्यूज डेस्क











