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गोपाल मैदान में लोक संस्कृति का महाकुंभ: 21वें टुसू मेला में उमड़ा जनसैलाब, 41 हजार का प्रथम पुरस्कार

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जमशेदपुर | 22 जनवरी, 2026

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​झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपरा का प्रतीक ‘टुसू पर्व’ बुधवार को जमशेदपुर के ऐतिहासिक गोपाल मैदान (बिष्टुपुर) में पूरी भव्यता के साथ मनाया गया। झारखंडवासी एकता मंच द्वारा आयोजित इस 21वें टुसू मेला में कोल्हान समेत पूरे राज्य की सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला।

​पारंपरिक लोककला और झुमर की धूम

​मेले का मुख्य आकर्षण सांस्कृतिक कार्यक्रम रहा, जहाँ ‘झुमर सम्राट’ संतोष महतो और उनकी टीम ने अपनी प्रस्तुति से समां बांध दिया। पारंपरिक वाद्य यंत्रों की थाप और संतोष महतो के चर्चित झुमर गीतों पर गोपाल मैदान में मौजूद हजारों दर्शक झूमने पर मजबूर हो गए।

​आकर्षण का केंद्र: विशाल मूर्तियां और गगनचुंबी चौड़ल

​सुबह 8 बजे से ही श्रद्धालु और प्रतिभागी अपनी कलाकृतियों के साथ मैदान में जुटने लगे थे। इस वर्ष मेले की खासियतें इस प्रकार रहीं:

  • चौड़ल और प्रतिमाएं: रंग-बिरंगे कागजों और बांस से बने ऊंचे-ऊंचे चौड़ल और मां टुसू की सुंदर मूर्तियां आकर्षण का केंद्र रहीं। पिछली बार इनकी संख्या 350 से अधिक थी, लेकिन इस बार यह आंकड़ा और भी बड़ा नजर आया।
  • अतिथियों का आगमन: कोल्हान के अलावा रांची, तमाड़, बुंडू और सिल्ली जैसे क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में लोग अपनी संस्कृति के प्रति प्रेम जताने पहुंचे।

​विजेताओं के लिए पुरस्कारों की बौछार

​आयोजकों ने इस वर्ष प्रतियोगिता की पुरस्कार राशि में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है। विजेताओं को विभिन्न श्रेणियों में सम्मानित किया जाएगा:

1. टुसू प्रतिमा प्रतियोगिता:

  • प्रथम पुरस्कार: 41,000 रुपये
  • द्वितीय पुरस्कार: 35,000 रुपये
  • तृतीय पुरस्कार: 31,000 रुपये

2. चौड़ल प्रतियोगिता:

  • प्रथम पुरस्कार: 31,000 रुपये
  • द्वितीय पुरस्कार: 25,000 रुपये
  • तृतीय पुरस्कार: 21,000 रुपये

3. बूढ़ी गाड़ी नाच प्रतियोगिता:

इसमें प्रथम स्थान पाने वाली टीम को 15,000 रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा।

​शहीदों को नमन और भव्य उद्घाटन

​समारोह का औपचारिक उद्घाटन मंच के मुख्य संयोजक आस्तिक महतो और सांसद विद्युत वरण महतो के नेतृत्व में हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत झारखंड के अमर शहीदों और मंच के पूर्व पदाधिकारियों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर की गई।

​देर शाम तक गोपाल मैदान दूधिया रोशनी में नहाया रहा, जहाँ पारंपरिक वेशभूषा में सजे पुरुष और महिलाएं झारखंडी गौरव का जश्न मनाते दिखे। यह मेला न केवल एक आयोजन था, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम साबित हुआ।