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ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में अब तक खुला ही नहीं लिफाफा

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में केंद्रीय चुनाव आयोग के दिये गये निर्देश से संबंधित पत्र बंद लिफाफा 25 अगस्त 2022 से ही राज्यपाल के पास पड़ा हुआ है.

उस लिफाफे के अंदर क्या है, इसको लेकर अभी तक आधिकारिक खुलासा तो नहीं हुआ है, लेकिन झारखंड में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ती रही है. 20 जनवरी 2022 को आरटीआइ कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो द्वारा जय झारखंड अभियान बैनर के नाम से राजभवन में शिकायत की गयी कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए माइनिंग लीज अपने नाम की है.

इसी के आधार पर भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (अब ओड़िशा के राज्यपाल) रघुवर दास और अन्य नेताओं ने तत्कालीन राज्यपाल रमेश बैस (अब महाराष्ट्र के राज्यपाल) से फरवरी, 2022 में से मिल कर इस बात की शिकायत की कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए हेमंत सोरेन ने एक खनन पट्टा अपने नाम कर लिया. इसलिए श्री सोरेन पर संविधान के अनुच्छेद 192 के तहत कार्रवाई होनी चाहिए. भाजपा की इस शिकायत पर ही राज्यपाल श्री बैस ने इस मामले में भारत निर्वाचन आयोग से जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9 ए के तहत अपनी राय मांगी. पुन: भाजपा की ओर से 12 मई 2022 को दीपक प्रकाश, बाबूलाल मरांडी आदि नेताओं ने राज्यपाल से राजभवन में मिल कर श्री सोरेन पर मुख्यमंत्री रहते अनगड़ा में खाता नंबर 187 व प्लाट नंबर 482 में 0.88 एकड़ खनन पट्टा अपने नाम कर लेने पर कार्रवाई करने की मांग की.

इसके बाद निर्वाचन आयोग ने भाजपा की शिकायत व राज्यपाल द्वारा राय मांगे जाने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को 20 मई 2022 तक जवाब देने के लिए कहा. साथ ही भाजपा अध्यक्ष को भी जवाब देने के लिए कहा गया. भाजपा की ओर से जवाब भेज दिया गया, जबकि श्री सोरेन ने जवाब देकर स्पष्ट किया कि उन्होंने कोई माइनिंग लीज नहीं ली है. वहीं आयोग ने श्री सोरेन को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हो कर जवाब देने के लिए 31 मई 2022 की तिथि निर्धारित कर दी. श्री सोरेन ने जवाब देने के लिए समय की मांग की. आयोग ने पुन: समय देते हुए उन्हें 14 जून, 2022 को जवाब देने के लिए समय निर्धारित किया. इस दिन फिर श्री सोरेन ने वकील की तबीयत खराब होने का हवाला देकर पुन: समय की मांग की. आयोग ने इस बार फिर 28 जून 2022 को जवाब देने के लिए समय निर्धारित किया और उन्होंने जवाब भी दिया. इस बीच 25 अगस्त 2022 को निर्वाचन आयोग ने श्री सोरेन के संबंध में अपना निर्देश स्पेशल मैसेंजर से राज्यपाल के पास एक लिफाफा के अंदर चिपका कर भेजा.

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दरअसल इस लिफाफे के अंदर जो पत्र है, उसके आधार पर तय हो सकता है कि राज्य के मुख्यमंत्री श्री सोरेन की विधानसभा सदस्यता खारिज हो जायेगी या बनी रहेगी. मीडिया में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होने लगी. लेकिन राज्यपाल श्री बैस ने इस पत्र को बंद लिफाफे से बाहर नहीं आने दिया और इसके चलते श्री सोरेन की सरकार कई महीनों तक अनिश्चितताओं के भंवर में फंसी रही. राजनीतिक गलियारे में फैली अनिश्चितताओं पर विराम लगाने के उद्देश्य से एक सितंबर, 2022 को सत्तारूढ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन का 10 सदस्यीय एक प्रतिनिधिमंडल राज्यपाल श्री बैस से राजभवन में मिला और आग्रह करते हुए जानना चाहा कि राजनीतिक गलियारे व मीडिया में संविधान के अनुच्छेद 192 के तहत चुनाव आयोग से बरहेट विधायक तथा राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लेकर जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 9 ए के तहत अयोग्य घोषित करने की बात कही जा रही है.

इसमें कितनी सच्चाई है. इसकी जानकारी उपलब्ध करायी जाये. खुलासा नहीं होने से अनिश्चितता पैदा हो रही है. राज्यपाल ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वस्त किया कि वे शीघ्र ही इसका खुलासा कर देंगे. इस बीच श्री बैस ने आड्रे हाउस में स्वास्थ्य विभाग के एक कार्यक्रम में मीडिया द्वारा लिफाफा खोलने के बारे में बात कही, तो श्री बैस ने कहा कि लिफाफा गोंद से ऐसा चिपका हुआ है कि वह खुल नहीं रहा है. 28 अक्तूबर 2022 को रायपुर में श्री बैस ने मीडिया से कहा कि हेमंत सोरेन मामले में एटम बम कभी भी फट सकता है. इधर फरवरी 2023 में श्री बैस का स्थानांतरण महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में हो गया. जाने से पहले श्री बैस ने राजभवन में मीडिया से रू-ब-रू होते हुए कहा कि नये राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन चाहें, तो चुनाव आयोग से आये पत्र के आधार पर फैसला कर सकते हैं.

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श्री बैस ने कहा कि उन्होंने इस पर फैसला इसलिए नहीं लिया, क्योंकि इससे राज्य की सरकार अस्थिर हो सकती थी. राज्यपाल एक संवैधानिक पद है, उन्होंने वही किया, जो संविधान के दायरे में रहा. चुनाव आयोग से आये पत्र पर निर्णय लेना या नहीं लेना, ये राज्यपाल का अधिकार है. उन्होंने कहा कि सही समय पर फैसला लेने के लिए सोचा था, लेकिन देखा कि लिफाफा मिलने से पहले के दो साल हेमंत सोरेन सरकार जितना काम किया, उससे अधिक काम लिफाफा आने के बाद करने लगी. ऐसे में उन्होंने राज्य हित में फैसला नहीं लेना उचित समझा. इधर, नये राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन से जब मीडिया ने लिफाफा के बारे में जानना चाहा, तो उन्होंने सिर्फ यह कह कर सवाल टाल दिया कि उन्होंने अब तक लिफाफा नहीं देखा है.


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