एक नई सोच, एक नई धारा

“डीजे की आवाज़ में दबी इंसानियत”—जमशेदपुर में भक्ति के नाम पर बढ़ते उन्माद ने खड़े किए गंभीर सवाल

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जमशेदपुर: लौहनगरी में हाल के दिनों में धार्मिक आयोजनों और जुलूसों के दौरान जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने शहर के प्रबुद्ध वर्ग और आम नागरिकों को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है। भक्ति और श्रद्धा के नाम पर जिस तरह से हथियारों का प्रदर्शन और डीजे का शोर बढ़ रहा है, उसने समाज की संवेदनशीलता पर गहरा प्रहार किया है।

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भक्ति या शक्ति प्रदर्शन?

​शहर के विभिन्न इलाकों में सरस्वती पूजा और अन्य जुलूसों के दौरान ऊंचे स्वर में बजते डीजे, भड़काऊ गीतों पर नृत्य और खुलेआम लहराते हथियारों ने उत्सव के आनंद को डर में बदल दिया है। बुद्धिजीवियों का कहना है कि आज भक्ति आत्मशुद्धि के बजाय अहंकार और शक्ति प्रदर्शन का जरिया बनती जा रही है।

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“मां सरस्वती विद्या और विवेक देती हैं, चापड़ और पत्थर नहीं।” – यह वाक्य आज शहर के गलियारों में एक कड़वी सच्चाई बनकर गूंज रहा है।

डीजे संस्कृति और सामाजिक सौहार्द

​स्थानीय नागरिकों ने डीजे संस्कृति के प्रति कड़ा रोष व्यक्त किया है। तेज आवाज़ न केवल बुजुर्गों, हृदय रोगियों और परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर रही है, बल्कि यह विवाद और हिंसा की जड़ भी बन रही है। जब संगीत का उद्देश्य आनंद के बजाय दूसरों को डराना हो जाए, तो वह विकृति बन जाता है।

​शिक्षाविदों ने इस बढ़ती उग्रता पर चिंता जताते हुए कहा कि शिक्षा का असली उद्देश्य इंसान बनाना है। यदि कलम पकड़ने वाले हाथों में हथियार और जुबान पर भड़काऊ नारे हों, तो यह हमारी शिक्षा प्रणाली और सामाजिक ढांचे की विफलता है। मां सरस्वती की सच्ची आराधना शांति, ज्ञान और संस्कारों के माध्यम से ही संभव है।

शिक्षा और संस्कारों पर प्रहार

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प्रशासन और समाज की जिम्मेदारी

​हालांकि पुलिस और प्रशासन समय-समय पर कार्रवाई करते हैं, लेकिन शहरवासियों का मानना है कि केवल कानून के बल पर बदलाव संभव नहीं है।

  • कठोर गाइडलाइन की मांग: समाजसेवी संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि डीजे की ध्वनि सीमा तय हो और हथियारों के प्रदर्शन पर गैर-जमानती कार्रवाई की जाए।
  • आत्ममंथन: समाज के हर तबके को यह सोचना होगा कि वे आने वाली पीढ़ी को विरासत में क्या दे रहे हैं—शांति या हिंसा?