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सुरों के महासंगम का अंत: लता दीदी के पदचिह्नों पर चलकर ‘आशा ताई’ ने भी दुनिया को कहा अलविदा

मुंबई/जमशेदपुर: भारतीय संगीत जगत के लिए एक युग का अंत हो गया है। ‘स्वर कोकिला’ लता मंगेशकर के निधन के ठीक चार साल बाद, उनकी छोटी बहन और महान पार्श्व गायिका आशा भोसले ने भी 12 अप्रैल, 2026 को दुनिया को अलविदा कह दिया। शनिवार, 11 अप्रैल को अचानक तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ रविवार को उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।n708235899177606854286001bfa77701f7ebf5e4b0214ea98115328bf3f825c19f5e493d0b64c3ff4894b0

​मृत्यु में भी दिखा अनोखा ‘बहन कनेक्शन’

​आशा भोसले और लता मंगेशकर के बीच केवल खून का रिश्ता ही नहीं था, बल्कि उनके प्रस्थान में भी कुछ ऐसे संयोग रहे जो प्रशंसकों को भावुक कर रहे हैं:

  • ​समान आयु: दोनों ही बहनों ने 92 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम यात्रा पूरी की।
  • ​अंतिम स्थान: दोनों ने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में ही अंतिम सांस ली।
  • ​एक ही दिन: संयोगवश दोनों का निधन रविवार के दिन ही हुआ।
  • ​निधन का कारण: लता जी की तरह ही आशा ताई का निधन भी मल्टी ऑर्गन फेलियर की वजह से हुआ।

​संघर्ष से सफलता तक: जब आशा ने गढ़ी अपनी अलग पहचान

​संगीत जगत में लता मंगेशकर की विशाल छाया के बीच अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन आशा भोसले ने अपनी आवाज की लचक और साहस से अपना एक अलग साम्राज्य खड़ा किया।WhatsApp Image 2026 03 07 at 17.22.01

​ओपी नय्यर और एसडी बर्मन का साथ:

संगीतकार ओपी नय्यर ने आशा की आवाज की गहराई को पहचाना और ‘नया दौर’ (1957) के जरिए इतिहास रच दिया। वहीं, जब 1957 में लता मंगेशकर और एसडी बर्मन के बीच मनमुटाव हुआ, तो आशा बर्मन दादा के कैंप की मुख्य गायिका बनीं। अगले पांच सालों में उन्होंने किशोर कुमार और मजरूह सुल्तानपुरी के साथ मिलकर ‘हाल कैसा है जनाब का’ और ‘छोड़ दो आंचल’ जैसे सदाबहार नगमे दिए।

​पंचम के साथ बदला संगीत का मिजाज:

आरडी बर्मन (पंचम) और आशा की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा में ‘फंक, जैज और रॉक-एन-रोल’ का तड़का लगाया। फिल्म ‘तीसरी मंजिल’ से शुरू हुआ यह सफर भारतीय संगीत की तासीर बदलने वाला साबित हुआ। पंचम की जटिल धुनों को आशा ने अपनी बेबाक आवाज से जीवंत कर दिया।

​अभिनय में भी आजमाया था हाथ

​कम ही लोग जानते हैं कि आशा जी ने ‘बड़ी मामी’ (हिंदी) और एक मराठी फिल्म में अभिनय भी किया था। हालांकि, उन्होंने जल्द ही महसूस कर लिया कि उनकी असली दुनिया अभिनय नहीं बल्कि सुरों की साधना है।

​आज ‘आशा ताई’ हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की कशिश और ‘तीसरी मंजिल’ के वो जादुई नगमे हमेशा संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजते रहेंगे।

​ब्यूरो रिपोर्ट, तीसरी धारा न्यूज़

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