रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने गुमशुदा बच्चों के मामले में पुलिस की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया है। वर्ष 2018 से लापता गुमला की एक 6 वर्षीय बच्ची के मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने गुमला पुलिस अधीक्षक (SP) को बुधवार को सशरीर उपस्थित होने का निर्देश दिया है।

“प्रयास जारी है” कहना पर्याप्त नहीं: हाईकोर्ट
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ ने ‘हेबियस कॉर्पस’ (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इतने वर्षों बाद भी बच्ची का पता न चल पाना पुलिस प्रशासन के लिए चिंताजनक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल यह कहना कि “प्रयास जारी हैं”, कोर्ट को संतुष्ट नहीं करता।
मामले की पृष्ठभूमि
- घटना: सितंबर 2018 में गुमला से 6 साल की बच्ची लापता हुई थी।
- याचिकाकर्ता: बच्ची की माँ चंद्रमुनि उराइन ने पुलिस से न्याय न मिलने पर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- कोर्ट की टिप्पणी: अदालत ने कहा कि यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि एक नाबालिग के मौलिक अधिकारों का हनन है।
जांच और एसआईटी पर सवाल
राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि मामले की जांच के लिए एसआईटी (SIT) का गठन किया गया है और तकनीकी साक्ष्यों को खंगाला जा रहा है। हालांकि, खंडपीठ ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि आखिर इतने लंबे समय तक कोई ठोस परिणाम क्यों नहीं आया? कोर्ट ने संकेत दिया कि यदि जांच में लापरवाही पाई गई, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी।
अगली सुनवाई का महत्व: बुधवार को होने वाली सुनवाई में गुमला एसपी को यह बताना होगा कि बच्ची की बरामदगी के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए हैं और वर्तमान में जांच की स्थिति क्या है। इस आदेश के बाद अब पुलिस महकमे में हड़कंप मचा हुआ है।










