रांची: झारखंड में नगर निकाय चुनाव की आहट के साथ ही राज्य का सियासी पारा चढ़ गया है। इस बार का चुनाव केवल शहरों की सरकार चुनने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भाजपा और सत्ताधारी महागठबंधन (JMM-कांग्रेस) के बीच वर्चस्व की एक बड़ी लड़ाई बन चुका है। जहां भाजपा अपने पुराने दबदबे को कायम रखने की चुनौती से जूझ रही है, वहीं झामुमो और कांग्रेस अपनी खोई हुई शहरी जमीन तलाशने में जुटे हैं।

भाजपा के लिए साख का सवाल और नई लीडरशिप
पिछले चुनाव में भाजपा ने राज्य के नगर निगमों में एकतरफा जीत हासिल की थी। मेयर पदों पर नजर डालें तो भाजपा का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद मजबूत रहा था:
- रांची: आशा लकड़ा (भाजपा)
- आदित्यपुर: विनोद श्रीवास्तव (भाजपा समर्थित)
- धनबाद: शेखर अग्रवाल (भाजपा)
- मेदिनीनगर: अरुणा शंकर (भाजपा)
- हजारीबाग व गिरिडीह: क्रमशः रोशन तिर्की और सुनील पासवान (दोनों भाजपा से जुड़े)
इस बार नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के कंधों पर इन नतीजों को दोहराने की भारी जिम्मेदारी है। साहू का दावा है कि भाजपा सभी 48 निकायों में जीत दर्ज करेगी और झारखंड में ‘महाराष्ट्र जैसे परिणाम’ देखने को मिलेंगे। हालांकि, भाजपा ईवीएम (EVM) के बजाय बैलेट पेपर से चुनाव कराए जाने का विरोध कर रही है。
JMM की ‘दबाव की राजनीति’ और कांग्रेस की तैयारी
भले ही चुनाव आधिकारिक तौर पर दलीय आधार पर नहीं हो रहे हों, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने उम्मीदवारों की घोषणा में बाजी मारकर विपक्ष और सहयोगियों दोनों को चौंका दिया है。
- सरायकेला-खरसावां: झामुमो ने यहाँ सबसे पहले अपने समर्थित उम्मीदवारों का एलान कर चुनावी हलचल बढ़ा दी है।
- महागठबंधन में पेच: कांग्रेस भी पीछे नहीं है; प्रदेश प्रभारी के. राजू लगातार बैठकें कर रहे हैं और पार्टी ने दावेदारों से फॉर्म भरवाए हैं。 झामुमो की जल्दबाजी को महागठबंधन के भीतर ‘दबाव की राजनीति’ के तौर पर भी देखा जा रहा है。
क्या शहरी मतदाता बदलेंगे मिजाज?
आमतौर पर शहरी क्षेत्रों को भाजपा का वोट बैंक माना जाता रहा है, लेकिन इस बार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने शहरी मतदाताओं को लुभाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। सूत्रों के अनुसार, सीएम के विदेश दौरे से लौटने के बाद झामुमो का अभियान और भी तेज होगा。
प्रमुख चुनौतियां और समीकरण
- महागठबंधन की एकता: क्या JMM और कांग्रेस सभी सीटों पर एक ही साझा उम्मीदवार खड़ा कर पाएंगे?
- चुनाव का तरीका: बैलेट पेपर बनाम ईवीएम की जंग जारी है。
- निर्दलीय उम्मीदवार: पिछली बार चास से भोलू पासवान और देवघर से रीता राज खवाड़े जैसे निर्दलीयों ने जीत दर्ज कर बड़ी पार्टियों को चौंकाया था, जो इस बार भी चुनौती बन सकते हैं。
निष्कर्ष: झारखंड में निकाय चुनाव इस बार त्रिकोणीय संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। भाजपा को अपने दुर्ग को बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, जबकि झामुमो और कांग्रेस के बीच का समन्वय यह तय करेगा कि महागठबंधन शहरी मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाता है।










