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झारखंड में 10 फरवरी के बाद SIR शुरू, 12 लाख मतदाताओं पर लटकी तलवार!

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झारखंड की राजनीति और चुनावी भविष्य को प्रभावित करने वाली एक बड़ी प्रशासनिक कवायद शुरू होने वाली है। राज्य में 10 फरवरी के बाद किसी भी समय मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की घोषणा की जा सकती है।

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इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची को पूरी तरह ‘साफ-सुथरा’ करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए राज्य के करीब 12 लाख मतदाताओं के नाम कटने की तलवार लटक गई है। इस विशेष पुनरीक्षण अभियान की तैयारियों को परखने के लिए भारतीय चुनाव आयोग की एक उच्चस्तरीय टीम 8 जनवरी को झारखंड पहुंच रही है। आयोग की टीम राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और जिलाधिकारियों के साथ बैठक कर ‘पैतृक मैपिंग’ की प्रगति की समीक्षा करेगी।

क्या है 2003 का ‘मैपिंग फॉर्मूला’?

गौरतलब है कि अब तक राज्य में मैपिंग का करीब 78% काम पूरा कर लिया गया है। इस बार की प्रक्रिया सामान्य नहीं है। निर्वाचन विभाग 2024 की वर्तमान मतदाता सूची का मिलान 2003 की मतदाता सूची से कर रहा है। इसे ‘पैतृक मैपिंग’ कहा जा रहा है। झारखंड में वर्तमान में लगभग 2.65 करोड़ पंजीकृत मतदाता हैं, जिनमें से 1.61 करोड़ की मैपिंग हो चुकी है। जिन वोटरों के नाम या उनके पूर्वजों के विवरण 2003 की सूची से मेल नहीं खा रहे हैं या जो सत्यापन के लिए पर्याप्त दस्तावेज नहीं दे पा रहे हैं, उन्हें सूची से बाहर किया जा सकता है। इसमें मृत, पलायन कर चुके और एक से अधिक स्थान पर दर्ज नाम शामिल हैं।

BLOs पर भारी दबाव

इस पूरी प्रक्रिया की सबसे कमजोर कड़ी बूथ लेवल अधिकारी (BLO) साबित हो रहे हैं। साहिबगंज सहित कई जिलों से आई रिपोर्ट्स के अनुसार, BLOs पर काम का अत्यधिक बोझ है। एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में हमें खुलेआम चेतावनी दी जाती है कि यदि लक्ष्य पूरा नहीं हुआ तो नौकरी से सस्पेंड कर दिया जाएगा।” अधिकारियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि 60-70 साल की उम्र के कई बुजुर्ग मतदाता 2024 की लिस्ट में तो हैं, लेकिन उनका रिकॉर्ड 2003 की लिस्ट से गायब है। ऐसे में उनका सत्यापन करना एक पहेली बन गया है। SIR प्रक्रिया के औपचारिक आगाज के बाद, चुनाव विभाग घर-घर जाकर गणन फॉर्म भरवाएगा। यह फॉर्म भरना हर मतदाता के लिए अनिवार्य होगा।
मतदाताओं में भ्रम और पैनिक

इसमें दी गई जानकारी के आधार पर ही तय होगा कि संबंधित व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में बना रहेगा या नहीं। गलत दस्तावेज देने वालों पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है। चूंकि 2003 के बाद राज्य की जनसंख्या और मतदाता आधार में बड़ा बदलाव आया है, इसलिए 2003 की सूची को आधार बनाने से आम जनता में भ्रम की स्थिति है। विशेषकर उन परिवारों में चिंता अधिक है जिनके सदस्य 2003 के बाद बालिग हुए और वोटर बने।