तीसरी धारा न्यूज / जमशेदपुर:
शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व पर दूसरे दिन माँ दुर्गा के दूसरे स्वरूप ‘मां ब्रह्मचारिणी’ की उपासना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी का यह रूप अत्यंत तेजवान, ज्ञान, तपस्या और वैराग्य का प्रतीक है। देवी का यह रूप भक्तों को अनंत फल प्रदान करने वाला और उनके जीवन के सभी कष्टों को दूर करने वाला माना जाता है। शहर के विभिन्न मंदिरों और घरों में मां के इस रूप की आराधना को लेकर विशेष तैयारियां और उत्साह देखा जा रहा है।
ब्रह्मचारिणी का शाब्दिक अर्थ और पौराणिक स्वरूप
माता के नाम में ‘ब्रह्म’ का अर्थ तपस्या है और ‘चारिणी’ का अर्थ आचरण करने वाली यानी तप का आचरण करने वाली होता है। मां ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल सुशोभित रहता है। देवी के इस स्वरूप की आराधना करने से साधक के अंदर तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार और संयम की वृद्धि होती है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से मां की पूजा करते हैं, उन्हें कठिन परिस्थितियों में भी अडिग रहने की शक्ति प्राप्त होती है।
मां ब्रह्मचारिणी की संपूर्ण पूजन विधि
नवरात्रि के दूसरे दिन सुबह स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर पवित्र करें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। मां को सफेद या पीले रंग के वस्त्र अर्पित करें क्योंकि यह रंग उन्हें अत्यंत प्रिय है। पूजन के दौरान मां को रोली, अक्षत, चंदन, पान, सुपारी, लौंग और इलायची अर्पित करें। इसके बाद उन्हें पंचामृत, फल और मिठाई का भोग लगाएं। अंत में मां के प्रिय फूल गुड़हल या कमल अर्पित करते हुए विधि-विधान से आरती करें।
विशेष मंत्र और भोग का महत्व
पूजा के दौरान मां ब्रह्मचारिणी के मंत्रों का जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। मां को शक्कर, पंचामृत या मिश्री का भोग लगाया जाता है, जिससे माता अत्यंत प्रसन्न होती हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, मां ब्रह्मचारिणी की पूजा करने से मंगल ग्रह से जुड़े दोष शांत होते हैं और जातक को साहस व ऊर्जा की प्राप्ति होती है। इस पावन अवसर पर मंदिरों में भी विशेष अनुष्ठान और भजन-कीर्तन का आयोजन किया जा रहा है।




















