नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में कानून-व्यवस्था के सामने एक नई और भयावह चुनौती खड़ी हो गई है। दिल्ली पुलिस और सामाजिक विशेषज्ञों की हालिया रिपोर्ट्स एक चिंताजनक सच उजागर कर रही हैं—दिल्ली के किशोर (12 से 17 वर्ष) तेजी से गंभीर अपराधों की राह पकड़ रहे हैं। विशेषकर झुग्गी-बस्तियों और पुनर्वास कॉलोनियों में स्थिति विस्फोटक होती जा रही है।

आंकड़ों की जुबानी: बढ़ता ग्राफ
दिल्ली पुलिस के तुलनात्मक आंकड़े बताते हैं कि नाबालिग अब केवल छोटी-मोटी चोरी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि हत्या और लूट जैसे जघन्य अपराधों में उनकी संलिप्तता बढ़ी है:
| अपराध की श्रेणी | 2024 (पकड़े गए नाबालिग) | 2025 (पकड़े गए नाबालिग) |
|---|---|---|
| कुल आपराधिक मामले | 3270 | 3833 |
| हत्या के मामले | – | +17 (पिछले वर्ष से अधिक) |
| जानलेवा हमले | – | +123 (पिछले वर्ष से अधिक) |
| लूटपाट | – | +109 (पिछले वर्ष से अधिक) |
हालिया वारदातों ने दहलाया दिल्ली का दिल
फरवरी 2026 के शुरुआती पखवाड़े में हुई घटनाओं ने समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया है:
- 12 फरवरी: नरेला (बवाना) में एक 17 वर्षीय किशोर की चाकू गोदकर हत्या, जिसमें 4 नाबालिग शामिल थे।
- 11 फरवरी: रोहिणी में मामूली विवाद में एक किशोर की हत्या।
- 9 फरवरी: मंगोलपुरी में स्कूल के सामने 15 वर्षीय छात्र की हत्या, जिसे चार नाबालिगों ने अंजाम दिया।
क्यों बदल रहा है गलियों का माहौल?
विशेषज्ञों के अनुसार, अपराध के इस बढ़ते ग्राफ के पीछे सामाजिक और आर्थिक कारण गहराई से जुड़े हैं:
- संवाद की कमी: झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर माता-पिता बच्चों को समय नहीं दे पाते, जिससे बच्चे मार्गदर्शन के अभाव में गलत संगति का शिकार हो जाते हैं।
- आर्थिक असमानता: रिपोर्ट के अनुसार, 75% मामले पुनर्वास बस्तियों से आते हैं, जहाँ अभाव और उपेक्षा बच्चों को अपराध की ओर धकेलती है।
- मानसिक स्वास्थ्य: मनोचिकित्सकों का मानना है कि कई किशोर ‘कंडक्ट डिसऑर्डर’ से जूझ रहे हैं, जहाँ वे हिंसक व्यवहार को बहादुरी समझने लगते हैं।
विशेषज्ञों की राय और समाधान
पुलिस अधिकारियों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि केवल ‘सख्ती’ इस समस्या का हल नहीं है। समाधान के लिए त्रिस्तरीय रणनीति की आवश्यकता है:
- पारिवारिक स्तर पर: माता-पिता बच्चों की दैनिक गतिविधियों और सोशल मीडिया व्यवहार पर नजर रखें।
- प्रशासनिक स्तर पर: स्कूलों में नियमित काउंसलिंग और खेलकूद गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए।
- सामुदायिक स्तर पर: झुग्गी-बस्तियों में ‘स्किल डेवलपमेंट’ और रोजगार के अवसर पैदा करना ताकि युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा मिले।










