शिमला | 16 फरवरी, 2026
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला स्थित फास्ट ट्रैक (पोक्सो) अदालत ने 2019 के एक संवेदनशील मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने एक नाबालिग लड़की से दुष्कर्म के दोषी को 20 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही, दोषी पर 10 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।

शादी का झांसा देकर किया था अपहरण
यह मामला रोहड़ू क्षेत्र का है। 17 अगस्त 2019 को आरोपी युवक एक 15 वर्षीय नाबालिग को शादी का झांसा देकर अपने ननिहाल ले गया था। परिजनों की शिकायत के बाद पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 22 अगस्त 2019 को युवती को बरामद किया। पीड़िता ने अपने बयान में बताया कि इस दौरान आरोपी ने उसके साथ कई बार जबरन शारीरिक संबंध बनाए।
फोरेंसिक साक्ष्य और स्कूल रिकॉर्ड बने आधार
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विवेक शर्मा की अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने पुख्ता सबूत पेश किए:
- मेडिकल और DNA रिपोर्ट: फोरेंसिक जांच में आरोपी के साक्ष्य पीड़िता से मेल खाए, जिससे अपराध की पुष्टि हुई।
- उम्र का प्रमाण: स्कूल प्रवेश रजिस्टर और पंचायत प्रमाणपत्र के आधार पर यह साबित हुआ कि पीड़िता की उम्र मात्र 15 वर्ष थी।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
फैसला सुनाते हुए न्यायाधीश विवेक शर्मा ने स्पष्ट किया कि नाबालिगों के खिलाफ अपराधों में समाज और कानून कोई नरमी नहीं बरत सकता। कोर्ट की मुख्य बातें:
- सहमति का अभाव: अदालत ने कहा कि चूंकि पीड़िता नाबालिग थी, इसलिए उसकी ‘सहमति’ का कानून में कोई महत्व नहीं है।
- शादी की दलील खारिज: आरोपी की “शादी करने के इरादे” वाली दलील को कोर्ट ने कानूनन टिकाऊ नहीं माना।
- कठोर संदेश: ऐसे अपराध समाज के लिए चिंता का विषय हैं और दोषियों को सख्त सजा मिलना अनिवार्य है।
पुनर्वास के लिए 4 लाख का मुआवजा
अदालत ने केवल सजा ही नहीं सुनाई, बल्कि पीड़िता के भविष्य और मानसिक स्वास्थ्य का भी ध्यान रखा है। कोर्ट ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को सिफारिश भेजी है कि पीड़िता के पुनर्वास के लिए उसे 4 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान किया जाए।
फैसले का सारांश:
| विवरण | सजा/प्रावधान |
|---|---|
| मुख्य सजा | 20 साल का कठोर कारावास |
| जुर्माना | ₹10,000 (अदा न करने पर 6 माह अतिरिक्त जेल) |
| मुआवजा (सिफारिश) | ₹4,00,000 (पुनर्वास हेतु) |
| धाराएं | IPC 376 और POCSO एक्ट की धारा 6 |
पुलिस का रुख: शिमला पुलिस ने इस फैसले का स्वागत किया है। अधिकारियों का कहना है कि वैज्ञानिक साक्ष्यों (DNA) और त्वरित जांच के कारण ही पीड़िता को 7 साल के भीतर न्याय मिल सका है।










