रांची: झारखंड के नगर परिषदों और नगर पंचायतों के चुनाव परिणामों ने इस बार बड़े राजनीतिक पंडितों को चौंका दिया है। छोटे शहरी क्षेत्रों के मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया है कि उनके लिए पार्टी की ब्रांडिंग से ज्यादा ‘व्यक्तिगत छवि’ और ‘स्थानीय मुद्दे’ मायने रखते हैं। चुनाव परिणामों में निर्दलीय उम्मीदवारों का पलड़ा भारी रहा है, जिन्होंने राज्य के प्रमुख दलों—भाजपा और झामुमो—को कड़ी टक्कर दी है।
निर्दलीयों का दबदबा: 17 नगरों में लहराया परचम
झारखंड के 39 छोटे शहरों में से 17 नगर अध्यक्ष पदों पर निर्दलीय प्रत्याशियों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इन उम्मीदवारों ने बिना किसी बड़े दलीय समर्थन के सड़क, जलापूर्ति, स्वच्छता और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे बुनियादी मुद्दों पर चुनाव लड़ा और जनता का भरोसा जीता।
- नगर परिषद: 20 परिषदों में से 9 पर निर्दलीयों का कब्जा।
- नगर पंचायत: 19 पंचायतों में से 8 पर निर्दलीयों की जीत।
भाजपा और झामुमो के बीच सीधा मुकाबला
बड़े दलों की बात करें तो भाजपा ने संतुलित उपस्थिति दर्ज कराते हुए कुल 11 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि सत्ताधारी झामुमो के खाते में 9 सीटें आई हैं।
- झामुमो का प्रभाव उसके पारंपरिक गढ़ संताल और कोल्हान क्षेत्र में बरकरार दिखा।
- भाजपा ने विभिन्न जिलों में अपनी संगठनात्मक मजबूती का परिचय दिया।
- कांग्रेस को मात्र 2 सीटों (फुसरो और रामगढ़ नगर परिषद) से संतोष करना पड़ा, जबकि माले ने धनवार नगर पंचायत में एक सीट पर जीत दर्ज की।
विजेताओं की सूची: एक नजर में
निर्दलीय विजेताओं का गढ़ (प्रमुख नाम):
| शहर | विजेता प्रत्याशी |
|---|---|
| गढ़वा नगर परिषद | आशीष सोनी उर्फ दौलत सोनी |
| चतरा नगर परिषद | अताउर रहमान |
| सिमडेगा नगर परिषद | ओलिवर लकड़ा |
| झुमरीतिलैया नगर परिषद | रमेश हर्षधर |
| लातेहार नगर पंचायत | महेश सिंह |
| जामताड़ा नगर पंचायत | आशा गुप्ता |
भाजपा समर्थित मुख्य विजेता:
- नगर परिषद: मिहिजाम (जयश्री देवी), मधुपुर (मिती कुमारी), लोहरदगा (अनिल उरांव), गुमला (शकुंतला उरांव)।
- नगर पंचायत: खूंटी (रानी टूटी), डोमचांच (उमेश वर्मा), बड़कीसरैया (शोभा देवी)।
झामुमो समर्थित मुख्य विजेता:
- नगर परिषद: साहिबगंज (रामनाथ पासवान), दुमका (अभिषेक चौरसिया), चाईबासा (नितिन प्रकाश), जुगसलाई (नौशान खान)।
- नगर पंचायत: बुंडू (जीतेंद्र उरांव), सरायकेला (मनोज कुमार चौधरी)।
गठबंधन की स्थिति: ‘इंडिया’ और ‘एनडीए’ को झटका?
दिलचस्प बात यह रही कि इस चुनाव में आजसू और राजद समर्थित किसी भी प्रत्याशी की जीत की जानकारी सामने नहीं आई है। नगर पंचायतों में कांग्रेस का खाता तक नहीं खुल सका, जो गठबंधन के लिए मंथन का विषय हो सकता है।
निष्कर्ष: झारखंड के शहरी मतदाताओं ने इस बार ‘पार्टी सिंबल’ के बजाय ‘लोकल लीडर’ को प्राथमिकता दी है। यह परिणाम आगामी चुनावों के लिए एक बड़ा संकेत है कि जनता अब रिपोर्ट कार्ड और जमीनी सक्रियता के आधार पर वोट कर रही है।











