जमशेदपुर (ब्यूरो): शहर की पुलिसिंग और जांच प्रक्रिया पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मामला जुगसलाई में हुए दीपक सिंह फायरिंग कांड से जुड़ा है, जिसमें अदालत से जमानत (Bail) मिलने के बावजूद एक परिवार को मानसिक रूप से प्रताड़ित करने का आरोप पुलिस पर लगा है।
क्या है पूरा मामला?
बागबेड़ा बजरंग टेकरी निवासी आज़ाद गिरी को जुगसलाई फायरिंग मामले के आरोपी सन्नी को हथियार उपलब्ध कराने के आरोप में नामजद किया गया था। इस मामले में कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आज़ाद गिरी को अदालत से विधिवत जमानत मिल चुकी है। नियमतः जमानत मिलने के बाद पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई रुक जानी चाहिए, लेकिन जमशेदपुर पुलिस के एक अधिकारी के व्यवहार ने सबको हैरान कर दिया है।
IO पर अभद्रता और धमकी का आरोप
आरोप है कि केस के जांच अधिकारी (IO) कृष्णा यादव बिना किसी सही जानकारी के अचानक आज़ाद गिरी के घर पहुंच गए। परिजनों का कहना है कि उन्होंने घर पर न केवल अभद्र भाषा और गालियों का इस्तेमाल किया, बल्कि वर्दी का रौब दिखाते हुए घर की कुर्की-जब्ती (Property Attachment) करने की भी खुली धमकी दी।
कार्यशैली पर उठे बड़े सवाल
हैरानी की बात यह है कि जब कोर्ट से जमानत मिल चुकी है और उसका आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है, तो क्या जांच अधिकारी को अपने ही केस की अद्यतन स्थिति (Current Status) की जानकारी नहीं है?
- क्या यह पुलिस की लापरवाही है या जानबूझकर किसी परिवार को डराने की कोशिश?
- कोर्ट के आदेश की अवहेलना करना क्या कानून के रखवालों को शोभा देता है?
पीड़ित पक्ष की मांग: “दोषी अधिकारी पर हो कार्रवाई”
आज़ाद गिरी के समर्थकों और परिजनों ने इस घटना पर कड़ा रोष व्यक्त किया है। पीड़ित पक्ष का कहना है:
“जब हमें कोर्ट से राहत मिल चुकी है, तो पुलिस किस आधार पर घर आकर बदतमीजी कर रही है? गाली-गलौज और कुर्की की धमकी देना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। हम प्रशासन से मांग करते हैं कि ऐसे अधिकारी पर तुरंत कार्रवाई हो ताकि बेगुनाह परिवारों को मानसिक प्रताड़ना से बचाया जा सके।”
इस घटना ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि अगर कानून का पालन करने वाले ही कोर्ट के आदेशों को नजरअंदाज करेंगे, तो आम जनता का भरोसा सिस्टम पर कैसे कायम रहेगा?
ब्यूरो रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज











