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डिजिटल महाप्रलय का खतरा: मिडिल ईस्ट की जंग में अब निशाने पर समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट केबलें, भारत भी रडार पर

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नई दिल्ली/जमशेदपुर। मिडिल ईस्ट (मध्य पूर्व) में छिड़ी जंग अब सिर्फ मिसाइलों और तेल के कुओं तक सीमित नहीं रह गई है। ईरान और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने अब दुनिया की ‘डिजिटल लाइफलाइन’ पर संकट खड़ा कर दिया है। ताजा रिपोर्ट्स के अनुसार, समुद्र के नीचे बिछी उन फाइबर ऑप्टिक केबलों पर हमले का खतरा बढ़ गया है, जिनके जरिए पूरी दुनिया का इंटरनेट और बैंकिंग सिस्टम चलता है।

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दो ‘डेथ जोन’ बने सबसे बड़ा खतरा

​इंटरनेट डेटा के इस महाजाल के लिए दो इलाके सबसे संवेदनशील और खतरे में हैं:

  1. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज: यहाँ समुद्र की गहराई महज 200 फीट है, जिससे केबलों को नुकसान पहुँचाना आसान है।
  2. बाब अल-मंडेब (लाल सागर): यहाँ ईरान समर्थित हूथी विद्रोही लगातार जहाजों को निशाना बना रहे हैं।

भारत के लिए क्यों है चिंता की बात?

​भारत का अंतरराष्ट्रीय इंटरनेट कनेक्शन इन्हीं समुद्री रास्तों पर टिका है। हॉर्मुज और लाल सागर के रास्ते AEAE-1, फाल्कन, गल्फ ब्रिज इंटरनेशनल और टाटा टीजीएन गल्फ जैसी प्रमुख केबलें गुजरती हैं। अगर इन केबलों को नुकसान पहुँचता है, तो भारत में इंटरनेट की गति और कनेक्टिविटी पूरी तरह चरमरा सकती है।

क्या-क्या हो सकता है ठप?

​विशेषज्ञों के अनुसार, इन केबलों पर हमले का मतलब सिर्फ स्लो इंटरनेट नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ होगा:

  • बैंकिंग और डिजिटल पेमेंट: अंतरराष्ट्रीय ट्रांजैक्शन और यूपीआई (UPI) सेवाओं पर असर पड़ेगा।
  • AI और डेटा सेंटर्स: गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और अमेजॉन के बड़े डेटा सेंटर इन्हीं केबलों से जुड़े हैं।
  • ऑनलाइन कामकाज: वीडियो कॉल, ईमेल और क्लाउड सेवाएं पूरी तरह बाधित हो सकती हैं।
  • वैश्विक अर्थव्यवस्था: पूरी दुनिया की डिजिटल इकोनॉमी इन समुद्री केबलों पर टिकी है।

समुद्र के नीचे बिछी है ‘सुरंगें’

​दावा किया जा रहा है कि हॉर्मुज के इलाके में समुद्र के अंदर संदिग्ध गतिविधियां बढ़ गई हैं। लाल सागर में 17 और हॉर्मुज में 3 बड़ी केबलें मौजूद हैं, जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ती हैं। अगर यहाँ कोई बड़ा विस्फोट या तोड़फोड़ होती है, तो उसे ठीक करने में हफ्तों लग सकते हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों डॉलर का नुकसान होगा।

ब्यूरो रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज