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एक नई सोच, एक नई धारा

तीसरी धारा न्यूज: असम का रण

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​असम में ‘झामुमो’ की दस्तक: हेमंत सोरेन का तिनसुकिया दौरा बना चर्चा का विषय, 40 सीटों पर सियासी समीकरण बदलने की तैयारी

​गुवाहाटी/रांची | विशेष संवाददाता

झारखंड की राजनीति के धुरंधर और झामुमो अध्यक्ष हेमंत सोरेन अब पूर्वोत्तर के ‘लाल मैदान’ यानी असम में अपनी नई सियासी बिसात बिछा रहे हैं। 2026 में होने वाले असम विधानसभा चुनाव से पहले हेमंत सोरेन की तिनसुकिया यात्रा ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। आदिवासियों और चाय बागान मजदूरों के बीच उनकी बढ़ती सक्रियता को भाजपा के ‘मजबूत किले’ में सेंधमारी के रूप में देखा जा रहा है।

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​तिनसुकिया में उमड़ा जनसैलाब: ‘एकजुट हों तो बदल देंगे दिशा’

​01 फरवरी 2026 को तिनसुकिया में आयोजित 21वीं आदिवासी महासभा में हेमंत सोरेन बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए। इस दौरान लगभग 30 हजार आदिवासियों के जमावड़े को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया:

  • ​एकजुटता की अपील: हेमंत सोरेन ने कहा कि यदि असम का आदिवासी और चाय मजदूर संगठित होकर मतदान करे, तो वह राज्य की सत्ता की चाबी अपने पास रख सकता है।
  • ​मजदूरी का मुद्दा: उन्होंने चाय बागान मजदूरों की 250 रुपये की कम दिहाड़ी पर सवाल उठाते हुए इसे ‘शोषण’ करार दिया और झारखंड की तर्ज पर कल्याणकारी योजनाओं का भरोसा दिलाया।

​35 से 40 सीटों पर झामुमो की नजर

​सूत्रों के अनुसार, झामुमो असम की उन 35 से 40 विधानसभा सीटों का गहराई से आकलन कर रहा है जहाँ आदिवासी और चाय जनजाति (Tea Tribes) निर्णायक भूमिका में हैं।

  • ​रणनीतिक दौरा: जनवरी के मध्य में जनजातीय कार्य मंत्री चमरा लिंडा, सांसद विजय हांसदा और विधायकों के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने असम के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा कर जमीनी हकीकत परखी थी।
  • ​पहचान की लड़ाई: बैठकों में यह बात निकलकर सामने आई कि यहाँ का आदिवासी समुदाय अब केवल ‘टी-ट्राइब’ बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि पूर्ण अनुसूचित जनजाति (ST) के दर्जे की मांग कर रहा है।

​आंकड़ों की बाजीगरी और भाजपा की प्रतिक्रिया

​असम में करीब 70 लाख आदिवासी आबादी है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 20% है। झामुमो इसी वोट बैंक के सहारे असम में अपनी जड़ें जमाने की कोशिश में है। हालांकि, असम की सत्तारूढ़ भाजपा इस सक्रियता को चुनौती नहीं मान रही है। भाजपा का तर्क है कि झामुमो का वहां कोई सांगठिक ढांचा नहीं है।

​तीसरी धारा विश्लेषण: क्या सफल होगा ‘झारखंड मॉडल’?

​हेमंत सोरेन का ‘जल, जंगल और जमीन’ का नारा असम के चाय बागानों में कितना असर दिखाएगा, यह तो वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि झामुमो अब केवल झारखंड तक सीमित नहीं रहना चाहती।

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