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विशेष श्रद्धांजलि: छायावाद के ‘अंतिम आलोक’ आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री, जिन्होंने साहित्य को दी शास्त्रीय गरिमा

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​साहित्य डेस्क | 05 फरवरी 2026

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हिंदी साहित्य के स्वर्ण युग ‘छायावाद’ की जब भी चर्चा होती है, प्रसाद, निराला, पंत और महादेवी के नाम स्वतः ही जेहन में आ जाते हैं। लेकिन इस महान परंपरा को उसके अवसान काल में संबल देने वाले और उसे नई ऊंचाइयों तक ले जाने वाले ‘पांचवें स्तंभ’ आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री ही थे। आज उनकी जयंती के अवसर पर साहित्य जगत उन्हें एक ऐसे मनीषी के रूप में याद कर रहा है, जिन्होंने अपनी लेखनी से छायावाद को शाश्वत बना दिया।

​निराला के मानस पुत्र और ‘निराला निकेतन’ के अधिष्ठाता

​5 फरवरी 1916 को बिहार के गया में जन्मे आचार्य शास्त्री संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। उनकी मेधा ऐसी थी कि किशोरावस्था में ही उन्होंने ‘काकली’ जैसे महान संस्कृत काव्य की रचना कर दी थी। महाप्राण निराला ने उनकी प्रतिभा को तराशा और उन्हें हिंदी साहित्य की ओर प्रेरित किया। मुजफ्फरपुर स्थित उनका आवास ‘निराला निकेतन’ दशकों तक साहित्यकारों के लिए तीर्थ के समान रहा, जहाँ शब्दों की साधना और वैचारिक विमर्श का अनवरत प्रवाह चला।

​छायावाद का परिष्कार और ‘राधा’ का नया स्वरूप

​शास्त्री जी ने छायावाद को केवल अपनाया नहीं, बल्कि उसका परिष्कार किया। उनकी रचनाओं—’रूप-अरूप’, ‘शिप्रा’ और ‘अवंतिका’ में प्रकृति का संगीत गूंजता है।

  • ​दार्शनिक राधा: उनके महाकाव्य ‘राधा’ ने सदियों पुरानी पारंपरिक धारणा को बदलकर राधा को एक आधुनिक, दार्शनिक और वैश्विक चेतना के रूप में स्थापित किया।
  • ​गीत तत्व: जहाँ छायावाद कहीं-कहीं दुरूह होने लगा था, शास्त्री जी ने उसे ‘गीत तत्व’ और ‘नवगीत’ से जोड़कर जन-सुलभ बनाया।

​पदक से बड़ा स्वाभिमान

​आचार्य शास्त्री न केवल अपनी लेखनी, बल्कि अपने स्वाभिमानी व्यक्तित्व के लिए भी जाने जाते थे। निराला की निर्भीकता उनके स्वभाव में थी। यही कारण था कि उन्होंने दो बार (1994 और 2010) पद्मश्री सम्मान को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया। उनका मानना था कि एक साधक के लिए उसकी रचनाओं का प्रेम ही सबसे बड़ा पुरस्कार है।

​एक युग का अंत, एक प्रेरणा का उदय

​आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री का अवसान केवल एक कवि का जाना नहीं था, बल्कि छायावाद की अंतिम जीवंत कड़ी का टूटना था। आज के दौर में, जब कविता अपनी गहराई खो रही है, शास्त्री जी का साहित्य हमें पुनः भाषा की शुद्धता, भावों की तरलता और स्वाभिमान के साथ जीने की प्रेरणा देता है।

​“साहित्य बाज़ारवाद का मोहताज नहीं होता, वह तो आत्मा की पुकार है।” – यह दर्शन शास्त्री जी ने न केवल लिखा, बल्कि जीकर भी दिखाया।

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