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मजदूर मशीन नहीं इंसान हैं: 8 घंटे के कार्य पर पूर्ण वेतन के ऐतिहासिक फैसले का सुमन कारूवा ने किया स्वागत

सरायकेला-खरसावां। श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में सर्वोच्च न्यायालय (सुप्रीम कोर्ट) द्वारा दिए गए एक ऐतिहासिक फैसले का मानवाधिकार सहायता संघ (अंतर्राष्ट्रीय) ने पुरजोर समर्थन किया है। सरायकेला-खरसावां जिला महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष श्रीमती सुमन कारूवा ने इस निर्णय को श्रम जगत में एक नई क्रांति करार दिया है।

क्या है फैसला?

​सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देशानुसार, अब सभी फैक्ट्रियों और संस्थानों में कार्यरत मजदूरों को 12 से 16 घंटे तक काम कराने के बजाय, मानक 8 घंटे के कार्य दिवस के आधार पर ही पूरा वेतन देना अनिवार्य होगा। यह फैसला उन मजदूरों के लिए बड़ी राहत लेकर आया है, जिन्हें लंबे समय तक काम करने के बावजूद उचित पारिश्रमिक के लिए संघर्ष करना पड़ता था।

“मजदूर मशीन नहीं, इंसान हैं”

​इस फैसले का स्वागत करते हुए श्रीमती सुमन कारूवा ने कहा, “मजदूर कोई निर्जीव मशीन नहीं, बल्कि एक हाड़-मांस का इंसान है। उसे भी आराम और अपने परिवार के साथ समय बिताने का अधिकार है। 12-16 घंटे काम लेना मानवाधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट के इस आदेश से मजदूरों के शोषण पर लगाम लगेगी और उनकी कार्यक्षमता के साथ-साथ जीवन स्तर में भी सुधार होगा।”

8 घंटे के कार्य दिवस का गौरवशाली इतिहास

​श्रीमती कारूवा ने इस दौरान श्रमिक अधिकारों के इतिहास पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि:

श्रमिकों में खुशी की लहर

​जिले के औद्योगिक क्षेत्रों में इस फैसले और श्रीमती कारूवा के समर्थन के बाद मजदूरों के बीच सकारात्मक माहौल देखा जा रहा है। मानवाधिकार सहायता संघ ने स्पष्ट किया है कि वे जमीनी स्तर पर यह सुनिश्चित करेंगे कि किसी भी संस्थान में मजदूरों का आर्थिक या शारीरिक शोषण न हो।

ब्यूरो रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज

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