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समान नागरिक संहिता (UCC) — समानता का पथ या परंपराओं पर प्रहार? एक विस्तृत विश्लेषण

नई दिल्ली: भारत में व्यक्तिगत कानूनों (Personal Laws) को लेकर जारी बहस के बीच ‘समान नागरिक संहिता’ (Uniform Civil Code – UCC) एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। संविधान के अनुच्छेद 44 में उल्लिखित इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य देश के हर नागरिक के लिए विवाह, तलाक, संपत्ति और उत्तराधिकार के एक समान नियम बनाना है।

क्या है वर्तमान स्थिति?

​वर्तमान में भारत में विभिन्न धर्मों के अपने अलग कानून हैं। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और पारसी समुदायों के लिए पारिवारिक मामले अलग-अलग संहिताओं के तहत सुलझाए जाते हैं। UCC इन सभी को हटाकर एक ‘एक देश, एक कानून’ की व्यवस्था की वकालत करता है।

UCC लागू करने के पक्ष में तर्क: क्यों है इसकी जरूरत?

  1. लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण: वर्तमान में अलग-अलग कानूनों के कारण महिलाओं के अधिकारों में असमानता है। UCC लागू होने से महिलाओं को विरासत, संपत्ति और तलाक के मामलों में पुरुषों के बराबर अधिकार मिलेंगे।
  2. समानता का संवैधानिक अधिकार: संविधान हर नागरिक को बराबरी का हक देता है। धर्म के आधार पर अलग कानून इस मूल भावना के विपरीत माने जाते हैं।
  3. न्यायिक और प्रशासनिक सरलता: अदालतों में हजारों मामले अलग-अलग धर्मों की जटिलताओं के कारण लंबित हैं। एक समान कानून से न्याय प्रक्रिया तेज और सरल होगी।
  4. राष्ट्रीय एकता: अलग-अलग कानूनों से उत्पन्न होने वाले सांप्रदायिक तनाव को कम कर यह समाज में समरसता और एकता को बढ़ावा देगा।

चुनौतियां और विरोध के सुर

​UCC को लागू करना जितना क्रांतिकारी है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी। इसके मुख्य विरोध के बिंदु निम्नलिखित हैं:

निष्कर्ष और भविष्य की राह

​सुप्रीम कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि UCC लागू करने का निर्णय संसद के अधिकार क्षेत्र में है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे केवल कानून थोपकर नहीं, बल्कि सभी समुदायों के साथ सार्थक संवाद और संवेदनशीलता के साथ लागू किया जाना चाहिए।

विशेषज्ञ मत: “यदि UCC को लैंगिक न्याय और सामाजिक समानता के चश्मे से देखा जाए, तो यह भारत के भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रख सकता है।”

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