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तलाक केस में ‘सीक्रेट रिकॉर्डिंग’ पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: प्राइवेसी से ऊपर ‘सच्चाई और न्याय’ को दी प्राथमिकता

नई दिल्ली: वैवाहिक विवादों और तलाक के मामलों में सबूतों की स्वीकार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी के बीच गुपचुप तरीके से रिकॉर्ड की गई बातचीत को तलाक की कार्यवाही में सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता है। कोर्ट ने माना कि ऐसी रिकॉर्डिंग अनुच्छेद 21 के तहत निजता (Privacy) के अधिकार का उल्लंघन नहीं करती हैं।

मामले की पृष्ठभूमि: विभोर गर्ग बनाम नेहा

​यह मामला 2009 में हुई एक शादी से जुड़ा है। पति ने 2017 में क्रूरता (Cruelty) के आधार पर तलाक की अर्जी दी थी। अपने आरोपों को साबित करने के लिए पति ने फैमिली कोर्ट में पत्नी के साथ टेलीफोन पर हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग, मेमोरी कार्ड और ट्रांसक्रिप्ट पेश किए।

​पत्नी ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे अपनी निजता का हनन बताया। हालांकि फैमिली कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया था, लेकिन पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने इसे रद्द करते हुए कहा था कि बिना सहमति के रिकॉर्डिंग करना ‘निजता के अधिकार’ का उल्लंघन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उसी आदेश को पलट दिया है।

सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणियां

​जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने फैसले में कई महत्वपूर्ण कानूनी बिंदुओं को स्पष्ट किया:

फैमिली कोर्ट की शक्तियों पर मुहर

​सुप्रीम कोर्ट ने फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 14 और 20 का हवाला देते हुए कहा कि फैमिली कोर्ट के पास सबूतों को स्वीकार करने के मामले में लचीलापन होता है। यदि कोई सबूत विवाद को सुलझाने में मददगार है, तो उसे तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

​सुप्रीम कोर्ट ने बठिंडा फैमिली कोर्ट के आदेश को बहाल करते हुए पति की अपील मंजूर कर ली है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि रिकॉर्डिंग को सबूत मानते समय उनकी सटीकता और प्रामाणिकता (Authenticity) की जांच कानून के अनुसार की जानी चाहिए।

महत्व: यह फैसला उन हजारों तलाक के मामलों में नजीर बनेगा जहां एक पक्ष घरेलू हिंसा या क्रूरता साबित करने के लिए डिजिटल सबूतों पर निर्भर है।

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