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विशेष रिपोर्ट: ‘लेडी टार्जन’ जमुना टुडू—सशक्त नारी और प्रकृति की रक्षक की अनकही कहानी

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चाकुलिया (जमशेदपुर): जब इरादे फौलादी हों और मन में कुछ कर गुजरने का जुनून हो, तो एक अकेली महिला भी पूरे तंत्र और माफियाओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के मुटुरखाम गाँव की रहने वाली जमुना टुडू, जिन्हें दुनिया आज ‘लेडी टार्जन’ के नाम से जानती है, इसी जीवटता की मिसाल हैं।

संघर्ष से पद्मश्री तक का सफर

​ओडिशा के एक छोटे से गाँव में जन्मी जमुना को बचपन से ही प्रकृति से प्रेम था। 1998 में चाकुलिया में शादी के बाद जब उन्होंने देखा कि लकड़ी माफिया बेरहमी से जंगल काट रहे हैं, तो उन्होंने इसे रोकने का संकल्प लिया। एक राजमिस्त्री की पत्नी और खुद हेल्पर के रूप में काम करने वाली जमुना ने घर की आर्थिक तंगी के बावजूद हार नहीं मानी।

जंगल बचाओ अभियान: जान की बाजी लगाकर सुरक्षा

​जमुना टुडू ने केवल पेड़ों को ही नहीं बचाया, बल्कि लकड़ी माफियाओं के दांत खट्टे कर दिए। उन पर कई हमले हुए, धमकियां मिलीं, लेकिन उन्होंने कानून का सहारा लिया और कई अपराधियों को जेल भिजवाया।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान

​जमुना टुडू की निस्वार्थ सेवा को देखते हुए भारत सरकार और कई प्रतिष्ठित संस्थाओं ने उन्हें सम्मानित किया है:

वर्षपुरस्कार/सम्मानप्रदानकर्ता
2012Awakened India Agents of Changeजयराम रमेश (पूर्व केंद्रीय मंत्री)
2014स्त्री शक्ति अवार्डसुभाष घई (फिल्म निर्देशक)
2017Women Transforming Indiaनीति आयोग एवं स्मृति इरानी
2019पद्मश्री अवार्डरामनाथ कोविंद (पूर्व राष्ट्रपति)
2023राष्ट्रीय नेतृत्व पुरस्कारद्रौपदी मुर्मू (माननीय राष्ट्रपति)

एक मलाल: राज्य सरकार की बेरुखी

​इतनी बड़ी उपलब्धियों के बावजूद, जमुना टुडू को इस बात का मलाल है कि उन्हें अब तक झारखंड सरकार से वह सम्मान या सहायता राशि नहीं मिली, जो अन्य राज्यों में ऐसे नायकों को दी जाती है। 50 की उम्र की ओर बढ़ रही जमुना आज भी अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं और इंटर की परीक्षा देने की तैयारी कर रही हैं।

तीसरी धारा न्यूज डेस्क

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