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लघुकथा : वो राजा, मैं राजा

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श्वेता अग्रवाल “ग़ज़ल” (सिलीगुड़ी, पश्चिम बंगाल)

अरे माँ, तूने मिस कर दी आज की पार्टी, कितनी शानदार थी। पता नहीं ये लोग दिन में पार्टी क्यों करते हैं, रात को होती तो तू भी शामिल रहती। जानती है माँ, एक बड़ी सी गाड़ी से सूट और बढ़िया बढ़िया महंगे कपड़े पहन कर कुछ लोग आये। एक बच्चे का जन्मदिन था। सब उसे राजा बुला रहे थे और सही में लग भी राजा जैसा ही था। वैसे तो मेरा भी नाम राजा है पर किस्मत राजा वाली नही मिली। खैर छोड़, अब सुन क्या हुआ। खूब सारे नौकर, उसके दोस्त, परिवार वाले हम सबके लिये मिठाई, कपड़े और फल लेकर आये थे। केक भी क्या मस्त था देखने मे भी और खाने में भी। आज तो मज़ा आ गया। हमारे साथ फ़ोटो भी ली उन लोगो ने। वो राजा और मैं राजा, पर मैं तो आपका जन्मदिन कभी नहीं मनाया। तू कब आएगी मेरा जन्मदिन मनाने बोल न माँ?”
“क्या राजा तू फिर शुरू हो गया। भाई अपनी तकदीर में यह सब नही लिखा। तू सोचना छोड़ दे। चल केक खाएगा तो बोल। अभी भी बचा हुआ है।” राजा का दोस्त कुमार उसे टोकते हुए कहता है।
“और सुन, तेरी माँ उधर नहीं, आसमान के इस तरफ है, मेरी माँ से बात कर रही, देख।” और दोनों खिलखिलाने लगे।

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