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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: धर्म परिवर्तन करते ही खत्म हो जाएगा SC का दर्जा, मुस्लिम-ईसाई बनने पर नहीं मिलेगा आरक्षण का लाभ

नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने आरक्षण और धर्म परिवर्तन को लेकर एक बड़ा और युगांतकारी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि अनुसूचित जाति (SC) से संबंधित कोई व्यक्ति मुस्लिम या ईसाई धर्म अपनाता है, तो उसका अनुसूचित जाति का दर्जा स्वतः ही समाप्त हो जाएगा।n705749004177434284726332648dd3b50db2b3acb653d75466a21d8c42f7ba5c4a3fa04145104471ee86a7

क्या है सुप्रीम कोर्ट का आदेश?

​सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में संविधान के 1950 के आदेश की धारा 3 का हवाला देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति का लाभ केवल उन्हीं व्यक्तियों को मिल सकता है जो उन धर्मों का पालन करते हैं जिन्हें संविधान के तहत अधिसूचित किया गया है। कोर्ट के अनुसार:

वापसी पर क्या हैं शर्तें?

​अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति दूसरे धर्म में जाने के बाद पुनः हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म में वापस लौटता है और दोबारा SC दर्जे का दावा करता है, तो उसे तीन अनिवार्य शर्तें पूरी करनी होंगी, जिससे यह साबित हो सके कि वह पुनः अपने मूल समुदाय और परंपराओं का हिस्सा बन गया है।

1950 का राष्ट्रपति आदेश और अनुच्छेद 341

​संविधान के अनुच्छेद 341 के तहत अनुसूचित जातियों की सूची तैयार की गई है। साल 1950 में जारी राष्ट्रपति के आदेश में स्पष्ट किया गया था कि केवल हिंदू धर्म के दलितों को ही एससी माना जाएगा। बाद में संशोधनों के जरिए इसमें सिख (1956) और बौद्ध (1990) धर्म को भी शामिल किया गया। सुप्रीम कोर्ट ने अब इसी संवैधानिक व्यवस्था को पुनः पुख्ता किया है।

क्यों अहम है यह फैसला?

​केंद्र सरकार ने 2022 में पूर्व सीजेआई केजी बालाकृष्णन के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया था, जिसे धर्मांतरित दलितों को आरक्षण देने के मुद्दे पर जांच करनी थी। राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष किशोर मकवाना के अनुसार:

“आरक्षण का आधार जाति है, धर्म नहीं। धर्म बदलने के बाद व्यक्ति की सामाजिक और धार्मिक पहचान बदल जाती है। यदि धर्मांतरण करने वालों को भी आरक्षण का लाभ दिया जाता है, तो यह मूल एससी समुदाय के अधिकारों का हनन और संविधान की मूल भावना के खिलाफ होगा।”

 

निष्कर्ष

​इस फैसले से यह साफ हो गया है कि आरक्षण की सुविधा केवल उन्हीं समुदायों तक सीमित रहेगी जो भारतीय मूल के उन धर्मों से जुड़े हैं जिन्हें ऐतिहासिक रूप से जातिगत भेदभाव का सामना करना पड़ा और जिन्हें संविधान में मान्यता दी गई है।

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