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गुमला: नवरतनगढ़ का ऐतिहासिक ‘कीर्ति स्तंभ’ अस्तित्व के संकट में, तालाब गहरीकरण से जमींदोज होने का खतरा

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गुमला/सिसई: झारखंड के ऐतिहासिक गौरव और नागवंशी स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना, 17वीं शताब्दी का एकाश्मक प्रस्तर स्तंभ (Monolithic Stone Pillar) आज प्रशासनिक लापरवाही के कारण खतरे में है। गुमला जिले के सिसई-बसिया रोड पर नवरतनगढ़ के समीप स्थित एक प्राचीन तालाब में खड़ा यह कीर्ति स्तंभ कभी भी गिर सकता है।n7098158541777042340286e9b5b6a6788683782d665095a4714c239a4bd1891f26af71ddd7c2a24faeeaf7

तालाब गहरीकरण बना धरोहर के लिए काल

​विचित्र विरोधाभास यह है कि एक तरफ राज्य के पर्यटन और संस्कृति मंत्री धरोहरों के संरक्षण का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर गुमला जिले का भूजल संरक्षण विभाग इसी प्राचीन तालाब का गहरीकरण कर रहा है। गहरीकरण के दौरान स्तंभ के आसपास की मिट्टी पूरी तरह हटा दी गई है, जिससे करीब 20 फीट लंबा यह विशाल स्तंभ अब केवल हवा के झोंके या जरा सी हलचल से जमींदोज हो सकता है।

झारखंड का इकलौता 20 फीट ऊंचा प्रस्तर स्तंभ

​पुरातत्वविदों के अनुसार, यह संभवतः झारखंड का इकलौता स्तंभ है जो एक ही पत्थर (एकाश्मक) को तराश कर बनाया गया है।

क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

​भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI), रांची मंडल के सहायक अधीक्षण पुरातत्त्वविद डॉ. नीरज कुमार मिश्र ने बताया कि यह स्तंभ ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत दुर्लभ है। इसके तीन ओर अभिलेख हैं और एक ओर खिला हुआ कमल है। इसे बचाने के लिए तुरंत इसके चारों ओर मिट्टी डालकर और ईंट-सीमेंट की दीवार बनाकर संरक्षित करने की आवश्यकता है।

प्रशासन की सफाई: “जानकारी नहीं थी, अब बचाएंगे”

​मामले के तूल पकड़ने पर संबंधित अधिकारियों का कहना है कि उन्हें तालाब के बीच में इस ऐतिहासिक स्तंभ की मौजूदगी की जानकारी नहीं थी। विभाग ने अब आश्वासन दिया है कि जानकारी संज्ञान में आने के बाद गहरीकरण के कार्य में सावधानी बरती जाएगी और स्तंभ को सुरक्षित करने का प्रयास किया जाएगा।

तीसरी धारा न्यूज का सवाल: क्या विकास की अंधी दौड़ में हम अपनी उन जड़ों को ही काट देंगे जो हमारी पहचान हैं? अगर समय रहते इस स्तंभ को संरक्षित नहीं किया गया, तो नागवंशी इतिहास का यह महत्वपूर्ण पन्ना हमेशा के लिए दफन हो जाएगा।

ब्यूरो रिपोर्ट, तीसरी धारा न्यूज

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