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दलमा बना ‘कार्निवोरस’ पौधों का नया ठिकाना: हाथियों के बाद अब मांसाहारी पौधों की खोज से शोधकर्ता उत्साहित

जमशेदपुर/दलमा: हाथियों के स्वर्ग के रूप में प्रसिद्ध दलमा वन्यजीव अभयारण्य अब अपनी जैव विविधता के एक और रहस्यमयी पहलू के लिए चर्चा में है। वन विभाग और शोधकर्ताओं ने अभयारण्य के विभिन्न क्षेत्रों में दुर्लभ मांसाहारी (Insectivorous) पौधों की पहचान की है, जो इस प्राकृतिक आवास की समृद्धि को दर्शाता है।

कहां मिले कौन से पौधे?

​अभयारण्य के अलग-अलग हिस्सों में दो प्रमुख मांसाहारी प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है:

कैसे काम करते हैं ये ‘शिकारी’ पौधे?

​ये पौधे उन क्षेत्रों में उगते हैं जहाँ मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी होती है। पोषण की इस कमी को पूरा करने के लिए इन्होंने एक अनोखा तरीका विकसित किया है:

  1. शिकार: ये पौधे कीटों और सूक्ष्म जीवों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
  2. ट्रैप: ड्रोसेरा अपनी चिपचिपी ग्रंथियों से कीटों को जकड़ लेता है, जबकि यूटिकुलेरिया पानी के भीतर वैक्यूम प्रेशर के जरिए कीटों को निगल जाता है।
  3. पाचन: शिकार को फंसाने के बाद ये पौधे एंजाइम्स के जरिए उसे पचा लेते हैं और नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।

संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कड़े कदम

​फॉरेस्ट गार्ड सह शोधार्थी राजा घोष ने इस खोज की पुष्टि करते हुए बताया कि इसकी विस्तृत जानकारी वरीय अधिकारियों को दे दी गई है। इन पौधों की संवेदनशीलता को देखते हुए विभाग ने निम्नलिखित योजना बनाई है:

दलमा के लिए गर्व का क्षण

​वन विभाग के अनुसार, मांसाहारी पौधों की मौजूदगी यह सिद्ध करती है कि दलमा का वातावरण प्रदूषण मुक्त है और यहाँ का पारिस्थितिक तंत्र बेहद संतुलित है। यह खोज भविष्य में वनस्पति विज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए नए द्वार खोलेगी।

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