प्रस्तुति: तीसरी धारा न्यूज
रांची/जमशेदपुर | १७ जुलाई, २०२६
जमशेदपुर (विशेष रिपोर्टर)। झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक संबंधों और सोशल मीडिया के दौर में डिजिटल संवादों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल फेसबुक पर किसी संदेश के आने या सोशल मीडिया पर दोस्ती होने को ‘अवैध संबंध’ या ‘क्रूरता’ का सबूत नहीं माना जा सकता। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस पीके श्रीवास्तव की खंडपीठ ने चाईबासा के पारिवारिक न्यायालय (फैमिली कोर्ट) द्वारा दिए गए तलाक के फैसले को पलटते हुए शादी को बहाल करने का आदेश दिया है।
क्या था पूरा मामला और हाई कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
दरसअल, पत्नी ने चाईबासा पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें उस पर क्रूरता और अवैध संबंधों के आरोप लगाते हुए पति के पक्ष में तलाक की डिक्री दे दी गई थी। इस मामले पर सुनवाई करते हुए झारखंड हाई कोर्ट ने कहा:
”अवैध संबंध का आरोप किसी भी महिला या व्यक्ति पर सामाजिक रूप से बहुत गंभीर कलंक लगाता है। इसलिए, इतने संवेदनशील और गंभीर आरोप को सिर्फ संदेह या अधूरे सबूतों के आधार पर सच नहीं माना जा सकता।”
‘थैंक यू मेरी जान’ वाले मैसेज की पूरी सच्चाई
पारिवारिक न्यायालय ने जिस मुख्य आधार पर तलाक की अनुमति दी थी, उसे हाई कोर्ट ने पूरी तरह गलत ठहराया।
- केवल सोशल मीडिया मित्र: पत्नी ने अदालत को बताया कि जिस व्यक्ति को लेकर आरोप लगाए जा रहे हैं, वह केवल एक फेसबुक फ्रेंड है और उसकी उससे कभी प्रत्यक्ष मुलाकात नहीं हुई है।
- मैसेज पर जताई थी आपत्ति: पत्नी ने स्वीकार किया कि फेसबुक मित्र ने उसे एक बार “थैंक यू मेरी जान” का मैसेज भेजा था, लेकिन उसने तुरंत इस पर कड़ी आपत्ति भी दर्ज कराई थी।
- हाई कोर्ट का निष्कर्ष: खंडपीठ ने पाया कि बिना किसी व्यक्तिगत मुलाकात या घनिष्ठता के प्रमाण के, महज एक सोशल मीडिया संदेश को अवैध संबंध का आधार मान लेना पारिवारिक न्यायालय की बड़ी भूल थी।
“जेब से १०-२० रुपये निकालना क्रूरता नहीं”
सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए यह भी कहा था कि वह उसकी जेब से पैसे चुराती थी। इस पर हाई कोर्ट ने बेहद व्यावहारिक और गंभीर टिप्पणी की:
- मजबूरी में लिए थे पैसे: पत्नी ने स्वीकार किया कि उसने दो बार पति की जेब से 10-20 रुपये निकाले थे, क्योंकि घर में साग-मुरी (दैनिक राशन) जैसी जरूरी चीजें खरीदने के लिए पैसे उपलब्ध नहीं थे।
- पति की विफलता उजागर: हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय वैवाहिक जीवन में गृहस्थी चलाने के लिए ऐसी बातें बेहद आम हैं। इसे ‘क्रूरता’ नहीं कहा जा सकता। इसके विपरीत, यह वाकया दर्शाता है कि पति घर की बुनियादी जरूरतों के लिए पैसे मुहैया कराने में विफल रहा था।
कथित प्रेमी को पक्षकार न बनाना भी कोर्ट की बड़ी तकनीकी भूल
हाई कोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया की खामियों को भी उजागर किया। बेंच ने कहा कि पारिवारिक न्यायालय ने कथित अवैध संबंध के आरोपी व्यक्ति को इस केस में पक्षकार (पार्टी) बनाए बिना ही फैसला सुना दिया। किसी भी व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़े इतने गंभीर मामले में, उस तीसरे व्यक्ति को बिना सुनवाई का अवसर दिए कोई भी टिप्पणी या फैसला करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।
इसके अलावा, अदालत ने इस बात को भी दर्ज किया कि जब पत्नी वापस अपने पति के घर रहने गई, तो किराए के घर पर ताला लगा मिला और उसे जबरन अंदर जाने से रोका गया।
चरित्र पर निराधार आरोप लगाना ही सबसे बड़ी क्रूरता
झारखंड हाई कोर्ट ने अंततः निष्कर्ष निकाला कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोपों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा है। उल्टे, पति द्वारा पत्नी के चरित्र पर लगाए गए ऐसे निराधार आरोप खुद पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आते हैं। इसी आधार पर माननीय उच्च न्यायालय ने तलाक का फैसला रद्द कर दोनों के विवाह को पुनः बहाल करने का आदेश जारी किया।
रिपोर्ट: तीसरी धारा न्यूज
